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पाप धन या नुकसान होने का मूल कारण क्या है - Paap dhan ya nukasaan hone ka mool kaaran kya hai




एक गांव में पंडित ब्राह्मण रहता था उसकी एक बेटी थी। ब्राह्मण का एक शिष्य था। जो उससे पंडिताई सीख रहा था।
शिष्य की शिक्षा समाप्त होने पर उस शिष्य ने पंडित से गुरु दक्षिणा मांगने का आग्रह किया पंडित के मन में विचार आया कि इस शिष्य को क्यों ना अपना दामाद बना लिया जाए ।
इस विचार के आते ही उसने शिष्य से गुरु दक्षिणा स्वरूप उसका दामाद बनने का आग्रह किया शिष्य ने गुरु दक्षिणा स्वरूप पंडित की बेटी से विवाह करना मंजूर कर लिया।
  इसके उपरांत विवाह पूर्ण हुआ शिष्य अपनी पत्नी को लेकर नदी के उस पार अपने गांव चला आया रात्रि की मंगलमय बेला में पंडित की बेटी ने अपने पति से कहा आप ज्ञानी पुरुष हो और मेरे पति हो मैं एक ज्ञानी पंडित की बेटी हूं इसीलिए आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूं उस सवाल का जवाब देकर आप मुझे से जो भी चाहेंगे वह मैं करने के लिए तैयार हो जाऊंगी ऐसी मेरी आपसे गुजारिश है।
 
शिष्य ने तुरंत ही पत्नी को वचन दे दिया। पत्नी ने सवाल पूछा कि बताओ पाप का बाप कौन है।
  शिष्य ने रात भर सभी पोथी पुरान खोल कर पढ़ कर देख लिए पर उसे कहीं भी पाप के बाप का नाम नहीं मिला।
   प्रातः का पहला प्रहर था उसके मन में विचार आया कि क्यों न मैं नदी के उस पार जाकर गुरुजी से ही सवाल का जवाब ले आया जाए।
  
विचार के आते ही शिष्य ने नदी की तरफ बढ़ चला ज्योही नदी पर पहुंचा उसने देखा कि गांव की धौबन कपड़े धो रही है । धौबन ने शिष्य को राम राम कहा और विवाह की शुभकामनाएं दी ,धौबन ने पूछा कि छोटे पंडित आप कहां जा रहे हो।

शिष्य ने कहा मैं नदी के उस पार अपने गुरु जी के दर्शन के लिए जा रहा हूं इस पर धौबन हंसने लगी और हंसते-हंसते शिष्य से कहा कि आप झूठ कह रहें हैं।
  क्योंकि आपकी और आपकी पत्नी की सारी बातें मैंने कल सुन ली है ।इसलिए मुझे पता है कि आप क्यों गुरुजी के पास जा रहे हो ।
  धौबन ने उससे कहा कि आपके सवाल का जवाब में बता सकती हुं। इस पर शिष्य ने कहा मैं पंडित होने के बावजूद इस सवाल का जवाब नहीं जानता, तो तू अनपढ़ गवार इस सवाल का जवाब कैसे दे सकती है।
   धौबन ने कहा कि छोटे पंडित आपको जवाब मिलने से मतलब होना चाहिए न कि मेरे अनपढ़ गवार होने से। इस पर शिष्य राजी हो गया । पर धौबन न भी जवाब देने से पहले एक शर्त रख दी ,शर्त यह थी कि पंडित को उसके घर जाकर भोजन ग्रहण करना होगा क्योंकि ब्राह्मण छोटी जात वालों के घर भोजन नहीं करते हैं।
   शिष्य थोड़ा पशोपेश में पड़ गया तब धौबन ने का कि छोटे पंडित आपको मैं जवाब के साथ अन्न जल और पांच सोने की मोहरें भी दूंगी। इस पर शीष्य का मन डोल गया और वह  धौबन के साथ उसके घर की तरफ बढ़ चला।
    घर पर पहुंच कर उसने  खाना बनाने की सामग्री मांगी क्योंकि ब्राह्मण अपना भोजन खुद बनाते हैं पर  धौबन ने उन्हें कहा आप पांच सोने की मौहर और ले लेना खाना तो मैं ही बनाऊंगी ।
    शिष्य राजी हो गया भोजन तैयार होने के बाद जब ग्रहण करने उस ने अपना हाथ बढ़ाया तो धौबन ने कहा अरे छोटे पंडित आप क्यों हाथ को खराब करते हो 5 सोने की मोहर और ले लेना खाना हम आपको खिला देते हैं।
     उसने सोचा मेरे सवाल का जवाब,  भोजन तथा 15 बौने की मौहरे सभी मेरे हित में है और प्रात: काल किसने देखा कि मैं किसके यहां किसके हाथ से भोजन ग्रहण कर रहा हूं और आश्वस्त होकर खाने के लिए अपना मुंह आगे बढ़ा दिया ।आगे बढ़ा उसके मुंह पर धौबन ने तमाचा जड़ दिया ।जिससे शिष्य आग बबूला हो गया।
      दौड़ने ने कहा आपको क्रोध नहीं करना चाहिए, में ने तो सिर्फ अपना वचन निभाया है ,और आपको आपके सवाल का जवाब दिया है । शिष्य ने कहा ऐसा कैसा जवाब है ,धौबन ने कहा पाप के बाप का नाम लालच है अगर आप के मन में लालच नहीं आता तो आप मेरे घर भोजन करने नहीं आते।

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