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कर्म से धर्म की एक राह पर - Karm se dharm kee ek raah par


समय सबका हमेशा अच्छा होता है, पर कर्म के हिसाब से ही समय चलता है।





समय की अनुकूलता आपके धर्म के आचरण पर निर्भर करती है ।





धर्म का साथ हो तो कर्म भी अच्छे और पाप रहित होते हैं । जो धर्म संगत होता है समय और हालात उसके हिसाब से चलते हैं ।





लोग समय को अच्छा या बुरा बताते हैं ,पर समय अच्छा होता है और ना ही बुरा होता है।





मनुष्य के कर्म ही अच्छे या बुरे होते हैं ,उसके फल स्वरुप ही देह को भोग मिलता है ।





सबसे पहले धर्म का आचरण जरूरी है ,क्योंकि बिना धर्म के मानव का कोई अस्तित्व नहीं है ।





आजकल लोग धर्म से ज्यादा जाति पर विश्वास करते हैं ।





धर्म सर्वोपरि है ,धर्म आदि और अंत है, धर्म ही अंत में काम और साथ आता है।





माया तो शरीर के साथ ही समाप्त हो जाती है ,फिर भी संसार में माया के बिना जीना संभव नहीं है ,पर सिर्फ जरूरत के समान ही अगर हम माया का संग्रह करें तो हमें ज्यादा कष्ट नहीं होगा, ज्यादातर जिसके पास जितनी ज्यादा माया उसका उतना ज्यादा मौह इस देह से होता है ।अंत में जब देह को त्याग ने का समय आने पर मोह और माया होने के कारण आत्मा को देह का त्याग करने में काफी कठिनाई होती है।





इसलिए दोस्तों इन सब का एक सरल उपाय यह है कि धर्म को पकड़ कर रखें





इससे व्यक्ति के मान-सम्मान में वृद्धि होती है , धर्म की व्याख्या को बताना मेरे बस की बात नहीं है ,उसको बताने के लिए प्रकांड पंडित ज्ञानी और विद्वान होना पड़ता हैं।





हम तो मानव है,धर्म की व्याख्या नहीं सिर्फ धर्म को मान सकते है, समझ सकते हैं ।





धर्म से मनुष्य के अंदर दया ,ममता ,आदर की भावना का संचार होता है जिसकी वजह से इंसान का चरित्र हीरे चमकने लगता है।





हम अगर भारतवर्ष का इतिहास को पड़ेंगे तो हमें ज्ञात होगा कि जिन लोगों ने भी अधर्म किया और धर्म का साथ छोड़ा उन सभी का पतन हुआ है।





जिसका मन सच्चा है ,निष्पाप है ,दयावान है वह व्यक्ति पूजनीय है ।





अहिंसा ,दया, प्रेम की भावना से जो धर्म होता है उस व्यक्ति को धर्म उच्च और प्रखर तेजस्वी शिखर पर विराजमान करता है ।





इस दुनिया में सर्वोत्कृष्ट धर्म क्या है ?





धर्म किसे कहते हैं ?





धर्म का प्रारूप क्या है ?





इन सब बातों को समझना बहुत ही मुश्किल है ।सरल भाषा में आज आपको मैं धर्म का मतलब समझाने का प्रयास कर रहा हूं पर यह मेरा मानना है इस को मानने के लिए में किसी को बाध्य नहीं कर सकता हूं ।





माता पिता की सेवा से बड़ा इस ब्रह्मांड में दूसरा कोई धर्म नहीं है ।





इसके उपरांत गुरु की सेवा भी सबसे बड़ा धर्म है, और अंत में बूढ़े बुजुर्ग जरूरतमंदों की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।





धर्म को दिमाग से नहीं, दिल से ,मन से अपना कर्तव्य समझकर करना ताकि धर्म भी आपको इस समाज में मान सम्मान उच्च शिखर प्रदान करे,





धर्म परायण व्यक्ति विश्वसनीय आदरणीय और पूजनीय होता है चारों दिशाओं में उसका गुणगान होता है


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