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भक्ति मुक्ति का कारण है। Bhakti Mukti ka Karan hai.

प्रभु के चरणों में बैठने का सुख, उनके चरणों की भक्ति का आनंद अद्भुत है। प्रभु से मांगना है तो सत्संग मांगना, प्रभु भक्ति मांगना। अभी तो तुम उससे धन-संपत्ति मांगते हो, संसार का वैभव मांगते हो, इधर उधर का कूड़ा - करकट मांगते हो। अरे, यह तो भाग्य का विषय है जो मिलना है वह तो मिलना ही है। ना मांगो तब भी मिलना है। कितना मिलना है - यह तो जन्म से पूर्व ही जन्म की पुस्तिका में लिख दिया जाता है । जो मिलने ही वाला है, उसे मांगना क्या ?

अगर तुम्हारा पैसा बैंक के खाते में जमा है तो तुम्हारा दुश्मन भी काउंटर पर बैठा हो तो उसे भी देना पड़ेगा, और यदि खाते में कुछ भी जमा नहीं है तथा तुम्हारा अपना ही लड़का काउंटर पर बैठा है, तो वह भी नहीं दे पाएगा।

प्रभु के चरणों में बैठकर इतनी ही प्रार्थना करना कि हे प्रभु ! तू मुझे हमेशा अपने चरणों में रखना। भगवान से चरण मांगना, उनका आचरण मांगना,उन जैसा समाधि - मरण मांगना, उन जैसा परम जागरण मांगना, क्योंकि जीवन की सब समृद्धि भगवान के ही श्री चरणों में ही बसती है। भगवान से कहना - प्रभु ! तूने जो हजारों - लाखों रुपए दिए हैं उसमें से कुछ लाख, कुछ हजार कम करना है तो कर लेना, जो सैकड़ों रिश्तेदार दिए हैं उनमें से कुछ कम करना है तो कर लेना, जो धन वैभव सुख सुविधा दी है उसमें कुछ कटौती करनी है तो कर लेना, जो बड़ा भारी मकान और लंबा चौड़ा व्यापार दिया है थोड़ा बहुत कम करना है तो कर लेना, लेकिन मेरे भगवान ! मेरी श्रद्धा को, मेरी भक्ति, को मेरी पूजा को कभी कम मत करना।

मेरी श्रद्धा भक्ति को हमेशा बढ़ाते रहना। श्रद्धा बढ़ेगी तो सुख भी बड़ेगा क्योंकि श्रद्धा सुख का द्वार है। भक्ति मुक्ति का कारण है।

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