Skip to main content

जीवन समर्पण मांगता है। Jeevan samarpan mangta hai.

आदमी ने दुनिया पर विश्वास किया लेकिन अपनी संभावनाओं, अपनी क्षमताओं पर कभी विश्वास नहीं किया। शायद यही कारण है कि वह महापात्र होकर भी भिक्षापात्र लेकर भीख मांगने को विवश है।

एक पाषाण को पूज्य बना देना, एक पत्थर को प्रतिमा बना देना बड़ा सरल है, लेकिन एक इंसान को भगवान बना पाना बड़ा कठिन है। एक पत्थर भगवान बन जाता है, पर आदमी नहीं बन पाता। क्या कारण है ? कारण स्पष्ट है,

पाषाण प्रतिमा बन जाता है, भगवान बन जाता है क्योंकि जब कोई शिल्पी उस पर कोई छैनी और हथोड़ा चलाता है, तो वह कोई प्रतिकार नहीं करता है। श्रद्धा समर्पण भाव से शिल्पी की हर चोट को सहता है, शिल्पी जितना काटता है कट जाता है, जितना छिलता है छिल जाता है, जितना मिटाता है मिट जाता है। वह पाषाण कभी कोई प्रतिकार नहीं करता लेकिन इंसान पर यदि कोई सद्गुरु जरा सी भी चोट करता है तो प्रतिकार करता है, उठ खड़ा होता है, भाग - दौड मचाता है, मरने - मारने के लिए खड़ा हो जाता है। यही वजह है कि इंसान भगवान नहीं बन पाता। यही कारण है कि जीवन में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन, कोई आमूल - चूल तब्दीली नहीं हो पाती है

जीवन समर्पण मांगता है। भारत की संस्कृति अपहरण की संस्कृति नहीं, अपितु समर्पण की संस्कृति है। अगर तुम एक बात अपने आराध्य, इष्ट के प्रति सर्वस्व समर्पण कर दो तो फिर प्रभु तुम पर बलिहारी हो जाएगा। तुमने कभी ख्याल किया : हमारे अधिकतर तीर्थ गंगा और नदियों के किनारे हैं। क्यों ? किस बात के प्रतीक हैं ?

इस बात के प्रतीक हैं की नदियां सागर की तरफ जा रही है, मिटने की तरफ जा रही हैं। तीर्थ तो वही है, जहां तुम्हें मिटने का बोध मिले। तीर्थ कहते हैं : यहां आकर तुम मिट जाओ, अपने अहंकार को मिटा डालो। नदी कहती है - मैं सागर में जाकर मिटूंगी, तू यहां आकर मिट जा। बस, मैं गंगासागर बन जाऊंगी और तू परमात्मा में समा जाएगा, तू परमात्मा हो जाएगा।

Comments

Popular posts from this blog

निंदा - Ninda

निंदा पत्नी ने पति से कहाँ- टीवी कि आवाज जरा कम कर दो इस आवाज की वजह से पडोस मैं जो पति- पत्नी झगड रहे है वह मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। सबक दुसरो कि निंदा सुनने में बडा आंनद आता है इस लिए गुरु के हितकारी प्रवचन हम सुन नहीं सकते हैं। निंदा करना और सुनना प्रवचन सुनने के लिए बाधक भी है और उसके प्रभाव को नाश करने वाला है।

लक्ष्मण को दिया था रावण ने अंतिम संदेश Lakshman ko diya tha ravan ne antim Sandesh

रावण जब मृत्यु शैया पर थे तब राम ने लक्ष्मण से कहा कि, "तुम रावण के पास शीघ्र पहुंचों। उसके पास अमूल्य ज्ञान है, उसे अर्जित करो। उससे जगत के लिए अंतिम संदेश ले आओ।" लक्ष्मण दौड़े। उसने रावण से कहा, "राम रो रहे हैं।" रावण के द्वारा वजह पूछने पर लक्ष्मण ने बताया कि "आपके अंतकाल से व्यथित हुए हैं। मुझे आपके पास अंतिम संदेश प्राप्त करने के लिए भेजा है। बड़े भैया ने कहलवाया है कि "आप अनेक गुणों के भंडार हैं। सीता का अपहरण तो आपकी आकस्मिक (कर्मोदय जनित) भूल थी।" आंख में अश्रु सहित रावण ने कहा कि "मेरे जैसे शत्रु का भी राम गुणकथन करते हैं। इसी लिए राम जगत में भगवान के रूप में पूजे जाते हैं।" अब आपको मेरा अंतिम संदेश यह है, कि" आज की बात कल पर छोड़नी नहीं चाहिए। मेरी इच्छा थी कि मैं स्वर्गगमन के लिए धरती पर सीढी रखूं, जिससे सभी जीव स्वर्गारोहण कर सकें, कोई भी नरक की दिशा में गति न करें, पर वह कार्य अधूरा ही रह गया। मैंने इस काम में विलंब किया और मौत वेग से आगे बढ़ गई। अब अफसोस करने में क्या लाभ। Rich Dad Poor Dad - 20th Anniversa...

मन में उत्पन्न भावों का प्रभाव अत्यंत बलशाली होता है। Maan main utpann bhavo ka prabhav atyant balshali hota hai.

एक हाथी प्रतिदिन पानी पीने के लिए बाजार में से होकर नदी के किनारे पर जाया करता था। मार्ग में दर्जी की दुकान आती थी। दर्जी पशु - प्रेमी था। हाथी जब भी उधर से गुजरता तो उसे खाने के लिए कुछ ना कुछ जरूर देता। हाथी भी खुश हो जाता। वह भी जब पानी पीकर वापस आता तो उद्यान में से पुष्पों को तोड़कर दर्जी की दुकान पर डाल जाता। प्रतिदिन का यह कार्यक्रम बन गया। एक दिन दर्जी किसी कार्य अवश्य बाहर गया हुआ था। दुकान पर उसका बेटा बैठा हुआ था। हाथी प्रतिदिन के कार्यक्रम के अनुसार दर्जी की दुकान पर जाकर अपनी सूंड को लंबा किया। दर्जी पुत्र को पिता के कार्य की जानकारी ना होने से अपनी भावना के अनुसार हाथी की सूंड पर जोर से सुई लगा दी। हाथी चुपचाप वहां से चला गया। हाथी पंचेइंद्रियों प्राणी है। उसके पास मन है। दर्जी पुत्र के दुर्व्यवहार से उसका मन ग्लानि से भर गया। नदी के किनारे पानी को पीया। प्रतिदिन तो उद्यान में जाकर फूलों को तोड़ता था, आज उसने बगीचे में ना जाकर गंदे नाले के पास गया, वहां सूंड में कीचड़ भर लिया। जैसे ही दर्जी की दुकान के पास पहुंचा और कीचड़ से भरी सूंड को उसकी दुकान पर उछाला। दर्जी पुत्र भी...