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सत्संग की महिमा -satsang ki mahima



एक मजदूर था, और संतों का प्यारा था ,सत्संग का प्रेमी था, उसने एक प्रतिज्ञा की थी, कि जब भी किसी का सामान उठाएगा या उसकी मजुरी करेगा तब उस यजमान को वह सत्संग सुनाएगा या उस यजमान से वह सत्संग सुनगा ।मजदूरी करने से पहले ही वह यह नियम सामने वाले यजमान को बता देता था और उसकी मंजूरी होने पर ही काम करता था।
एक बार एक सेठ आया उसने सामान उठाने को कहा, मजदूर जल्दबाजी में अपना नियम भूल गया ,और सामान उठाकर सेठ के साथ चलने लगा, आधे रास्ते जाने के बाद मजदूर को अपना नियम याद आया तो उसने बीच रास्ते में ही सामान उतार कर रख दिया और सेठ से कहा - सेठ जी मेरा नियम है, कि आप मुझे सत्संग सुनाएं या मैं आपको सुनाउ तभी मैं सामान उठाउंगा ।
सेठ को जरा जल्दी थी इसीलिए सेठ ने कहा भाई तू ही सुना मैं सुनता हूं ।
मजदूर के अंदर छुपा संत जाग गया और सत्संग के प्रवचन धारा बहना शुरू हो गई। सफर सत्संग सुनते सुनते कट गया । सेठ के घर पहुंचते ही सेठ ने मजदूर का पैसा अदा कर दिया । मजदूर ने पूछा - क्यों सेठ जी ,सत्संग याद रहा ।
मैंने तो कुछ नहीं सुना, मुझे जल्दी थी, और आधे रास्ते आने के बाद में दूसरा मजदूर कहां खोजने जाऊं , इसलिए आप की शर्त मान ली और हां हूं करता आप के साथ चल पड़ा मुझे तो सिर्फ अपने काम से मतलब था , आप की कथा से नहीं।
एक जमाना था जब राजा राजपाट छोड़कर गुफाओं और जंगल में गुरुओं को तलाश करके उनके सानिध्य में सत्संग किया करते थे।
भक्त रूपी मजदूर को आश्चर्य हुआ उसने अपनी अंतरात्मा में डुबकी लगाई और सेठ की तरफ देख कर कहा - सेठ जी कल शाम सात बजे आप इस संसार से चले जाओगे ।
सेठ सदमे में आ गया, भक्त मजदूर की वाणी में तेज था, सेठ भक्त की सच्चाई समझ गया उसने उसके चरण पकड़ लिए तब भक्त ने कहा - सेठ जी जब आप यमपुरी जाओगे तब वहां आप के पाप और पुण्य का हिसाब करने में आएगा । आपके जीवन में पाप ज्यादा और पुण्य क
म है । थोड़ी देर पहले जो रास्ते में आपने सत्संग सुना था उसका भी थोड़ा पुण्य है । वहां आप से पूछने में आएगा कि आपको पाप का फल भोगना है या पहले पुण्य का फल भोगना है। तब आप यमराज के सामने कबूल करना कहना मुझे पाप का फल भोगना मंजूर है पर पुण्य का फल भोगना नहीं है पर मुझे पुण्य का फल देखना है।
दूसरे दिन सेठ यमपुरी पहुंचे चित्रगुप्त ने सेठ के पाप पुण्य का हिसाब किया तब यमराज ने सेठ से पूछा कि आपको पाप को भोगना है या पुण्य को पहले भोगना है ।
सेठ ने कहा - पुण्य का फल भोगना नहीं चाहता हूं और पाप का फल भोगने से इंकार भी नहीं है , पर हे यमदेव मुझे पर एक कृपा करो कि सत्संग के पुण्य का फल मुझे देखना है ।
पाप पुण्य का फल देखने की कोई व्यवस्था यमपुरी में नहीं थी , क्योंकि पाप पुण्य का फल तो भोगना पड़ता है दिखाना नहीं पड़ता है।
यमराज को कुछ समझ नहीं आया क्योंकि ऐसा केस पहली बार ही यमपुरी में आया था।
यमराज उसे लेकर इंद्र के पास पहुंचे , तो इंद्र ने कहा पुण्य का फल आप भोग तो सकते हैं उसे दिखा नहीं सकते हैं ।
सेठ ने कहा - नहीं सत्संग के पुण्य का फल भोगना नहीं है मुझे देखना है ।
इंद्र भी सेठ की बातों में उलझ गया , चित्रगुप्त यमराज और इंद्र तीनो सेठ को लेकर भगवान आदि नारायण विष्णु जी के पास पहुंचे, इंद्र ने पूरी बात विस्तार बताई ।
भगवान मंद मंद मुस्कुरा रहे थे , पूरी बात सुनने के बाद भगवान ने तीनों से अपने अपने लोक प्रस्थान करने को कहा और सेठ को वहीं रुकने को कहा।
सेठ ने फिर कहा - प्रभु ! मुझे सत्संग के पुण्य का फल भोगना नहीं देखना है।
प्रभु ने कहा - चित्रगुप्त, यमराज और इंद्र जैसे देव तुझे अपने साथ में आदर से यहां लेकर आए हैं ,और तुम मुझे साक्षात देख रहे हो इससे ज्यादा और क्या सत्संग के फल का पुण्य देखना चाहते हो ।
जो चार कदम चल कर ब्रह्म ज्ञान के सत्संग का श्रवण करते हैं उनका यमराज की भी ताकत नहीं कि कुछ बिगाड़ सके।
"ब्रह्म ज्ञान का सत्संग सुनना इतना महान है।"

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