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बैठिए मत। चलते रहिए। Baithe mat. chalte rahiye.

अपना काम खुद करते रहिए। बच्चों को तो पालिये मगर इच्छाओं‌ और चिंताओं को मत पालिये। आज का आदमी अपने बच्चों को तो कम पलता है, अपनी इच्छाओं को ज्यादा पालता है। हम बच्चों से ज्यादा इच्छाओं को पालते हैं। हम बच्चों को नहीं, बच्चों के रूप में अपनी इच्छाओं को पालते हैं। बेटे का जन्म हुआ नहीं कि मां - बाप के सपने शुरू हो जाते हैं। बच्चा एक पैदा होता है, मां - बाप के सपने हजार पैदा हो जाते हैं, कि बेटा को यह बनायेंगे कि बेटे को वो बनायेंगे कि बेटा से ये करायेंग, कि बेटे से वो करायेंग। मतलब साफ है, जो हम अपनी जिंदगी में नहीं कर सके, अब वह बेटे से करायेंगे। जो हम जिंदगी में खुद नहीं बन सके, अब वह बेटे को बनायेंगे। मतलब साफ है कि बंदूक तो हमारी होगी और कंधा बेटे का होगा। हम जिंदगी में बंदूक नहीं चला सके तो अब बेटे के कंधे पर रखकर बंदूक चलायेंगे, हम डॉक्टर नहीं बन पाये तो अब बच्चे को बनायेंगे। बच्चे को जबरदस्ती डॉक्टर बनायेंगे।

भले ही उसके बच्चे डॉक्टर बनने में न हो, वह भले ही इंजीनियर बनना चाहता हो, लेक्चरर बनना चाहता हो, पायलट बनना चाहता हो, संत बनना चाहता हो, पत्रकार बनना चाहता हो, मगर नहीं, हम उसको डॉक्टर बनायेंगे - यह बच्चे के साथ ज्यादती है। अरे ! बच्चे की भी तो रुचि देखी जानी चाहिए कि वह क्या बनना चाहता है ? मगर कोई मां-बाप बच्चों की रुचि का ख्याल नहीं रखते। अपनी इच्छाएं और अभिलाषाएं जबरदस्ती बच्चों पर थोपते/लादते है। बच्चे की रुचि इंजीनियर बनने में है और मां-बाप की उसे डॉक्टर बनाना चाहते हैं। अब क्या होगा ? वह न तो काबिल डॉक्टर बन पाएगा और ना ही इंजीनियर।न तो इधर का रहेगा, न तो वह उघर का रहेगा। वह सारी जिंदगी अधर में रहेगा।

आशा बहुत भटकाती है। आशा बहुत दौड़ाती है। सारी दुनियां आशा की खातिर ही दौड़ती नजर आती है।

आशा ही दु:खदाई नहीं है, चिंता भी दु:खदाई है। आज का आदमी चिंतन में नहीं, चिंता में जी रहा है। चिन्ता चिता है। चिन्ताओं को उगल डालिए। चिंता जहर है। इससे दूर रहिये।

चिन्ता छोड़िये। निराशा से ऊपर उठिये, आशावादी बनिए। जीवन को आशा की दृष्टि से देखो। निराशा की आदत छोड़ दो। हर अंधेरी रात में चमकते हुए तारे और हर काले बादल में चमकती हुई बिजली का गोटा जड़ा है। गुलाब की झाड़ी में कांटे मत गिनों, फूल गिनों। जो कांटे गिनने में रह जाते हैं उनके लिए फूल भी कांटे हो जाते हैं। संसार में सुख से अधिक दुःख हैं। स्वर्ग से अधिक नर्क है, सज्जन से अधिक दुर्जन हैं। ज्ञानी तो वह जो दुःख में से भी सुख खोज लेते हैं। दुःख को सुख में बदल लेते हैं। जो आशा को टूटने नहीं देते, जीवन के आखिरी वक्त तक निराशा को अपने पास फटकने नहीं देते

आदि शंकराचार्य मनुष्य जीवन का चित्रण कर रहे हैं वह कह रहे हैं.....

अंग - अंग गल गये, बाल पक गये, दांत टूट गये, भाग्य रूठ गये, संगी- साथी छूट गये फिर भी आशाएं जिंदा है, आकांक्षाएं जीवित हैं। आंखों की चमक जाती रही, चेहरे की लालीमा खो गई, तन थक गया, शरीर बूढ़ा हो गया, मगर मन अभी भी व्याकुल है, पागल है।

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