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इसे कहते हैं धर्मी। Ise kahate Hain dharmi.

सुख और दु:ख जीवन के मेहमान हैं। जैसे घर आए मेहमान का स्वागत करते हैं वैसे ही इनका भी करना चाहिए। परंतु आज मानव की दशा यह है कि सुख आने पर फूला नहीं समाता और दु:ख आने पर हाय - हाय करके आकाश पाताल एक कर देता है। वस्तुतः "ज्ञानी कहते हैं कि सुख में लीन मत बनो, दु:ख में दीन मत बोनो।"
सुख-दु:ख अन्य कोई नहीं है। हमारे ही बुलाए हुए अतिथि हैं। हमारी आमंत्रण पत्रिका को प्राप्त करके ही आए हैं। दु:ख जीवन में जो आते हैं ? क्योंकि हमने ही भूतकाल में इस दुष्कृत्य किए थे, पापों का आचरण किया था, जिसने उस दुष्कृत्य और पापाचरण का सेवन नहीं किया। उसे दु:ख भी नहीं आते। हमारे ही दुष्कृत्य और पाप प्रक्रिया दु:खों को बुलाने की आमंत्रण पत्रिका है।
रास्ते में चार पांच व्यक्ति इकट्ठे साथ में चलते हैं परंतु दो को कुत्ता काट जाता है तीन बिल्कुल स्वस्थ रहते हैं कभी विचार किया ऐसा क्यों ?
एक बच्चा पूरी प्रथम मंजिल से नीचे गिरता है तो भी उसे जरा चोट नहीं आती है और दूसरा बालक 4 -5 सीढ़ियों से नीचे गिरता है उसको फैक्चर हो जाता है हड्डी पसली टूट जाती है। महीनों का प्लास्टर लग जाता है। जरा सोचिए ऐसा क्यों ?
हवाई जहाज में दो तीन सौ व्यक्ति बैठे होते हैं कई बार अचानक गिर जाने से 50 व्यक्ति बच जाते हैं। बाकी सारे मृत्यु के मुख में चले जाते हैं। ऐसा क्यों ?
हाईवे पर केजी से दौड़ती हुई कार का एक्सीडेंट होने से बड़े-बड़े व्यक्ति मर जाते हैं, दो तीन छोटे बच्चे जीवित उनको जरा भी चोट नहीं आती‌। ऐसा क्यों ?
इस सभी का उत्तर एक ही है एक जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर जिस व्यक्ति ने इस जन्म में या पूर्व जन्म में जैसे-जैसे कृत्य किए होते हैं वैसा ही उसे फल मिलता है।
अतः दु:ख और सुख में अपनी मन: स्थिति बराबर रखनी चाहिए। यह दोनों मेहमान है, कभी नहीं भूलना चाहिए कि जीवन में सदा सुखों की वसंत भी नहीं रहती और सदा दु:खों का पतझड भी नहीं रहता।
एक धर्मिष्ठ सेठ जी प्रतिदिन उपाश्रय में गुरुदेव का प्रवचन श्रवण करने जाते थे। एक दिन उसका नित्यक्रम टूट गया। वह प्रवचन सुनने नहीं आए। गुरुदेव ने सोचा नित्य प्रति समय पर आने वाले सेठ जी आज क्यों नहीं आए। किसी भक्त से पूछा उसने कहा - कि "आज उसका जवान पुत्र मर गया है वह उसकी अंतिम क्रिया कर रहा है।"
दोपहर के समय सेठ जी गुरु वंदन करने आए। गुरु के पूछने पर कहा - गुरुदेव 21 वर्ष से मेरे घर में एक मेहमान आया हुआ था, उसे छोड़ने के लिए गया था। इसी कारण आज प्रवचन श्रवण नहीं कर सका।
गुरुदेव बोले - भैया ! तुम्हारे किसी स्वजन ने कहा था कि उनका युवान पुत्र दुनिया से चला गया है इसीलिए नहीं आया और तुम अलग बात कर रहे हो।
सेठ ने मन को स्वस्थ करते हुए कहा - गुरुदेव ! पुत्र तो चला गया यह बिल्कुल सत्य है। एक ही एक पुत्र के जाने से दु:ख तो स्वाभाविक ही होता है। परंतु आप के उपदेश को मैंने अपने सामने रखा है। संसार की यही रिति है। परिस्थिति अपने हाथ की बात नहीं है, परंतु मन: स्थिति अपने हाथ की बात है। मैंने अपनी मन:स्थिति को बदल कर ऐसा माना कि मेरे घर में जन्म लेने वाला पुत्र मृत्यु को नहीं प्राप्त हुआ अपितु मेरे घर में आया मेहमान आज चला गया है। सेठ की मन: स्थिति को देखकर गुरु महाराज के मुख से धन्य धन्य शब्द निकल पड़े। तभी तो एक कवि ने कहा है -
कांटे नहीं फूल बन चलना सीखो,
ज्वाला नहीं ज्योति बन जलना सीखो।
जीवन में आती हुई कठिनाइयों से,
डरना नहीं समझ कर चलना सीखो । ‌।

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