Skip to main content

सत्य कहां है ? Satya Kahan hi.

जीवन में सत्य का आग्रह बुद्धिमानों को होना चाहिए। सत्य जीवन का परम तत्व है। सत्य रहित संसार अपनी कल्पना से बाहर है। अपने जीवन में किसी क्षण सत्य के लिए आग्रही बनने का प्रयत्न करते हुए सामान्य व्यक्ति को भी जब हम देखते हैं या सुनते हैं तो सचमुच सत्य के प्रति सम्मान और बढ़ जाता है, परंतु सत्य को समझना सरल नहीं है। किसी भी समय की बात जब आप सुनेंगे तो उसमें सत्य की महिमा का भारी बखान होगा ही। अरे, आज के समय में भी सत्य का प्रभाव कम नहीं हैं परंतु सत्य किसे कहा जाए ? यह एक अनुत्तरित प्रश्न है।
प्रथम बात यह है कि सत्य हमेशा निरपेक्ष नहीं, सापेक्ष हुआ करता है। किसी भी मंतव्य का जब आगॄह में युक्त "ही" के साथ प्रतिपादन किया जाता है तब वह मंतव्य सत्य की सामान्य मर्यादा का उल्लंघन करता है। सत्य कभी निरपेक्ष नहीं होता, यह त्रिकाल सत्य है। सत्य के स्वरूप को समझने के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति को वस्तुमात्र के सापेक्षत्व को जानने हेतु की आंखें खोलनी चाहिए।
आत्मा से लेकर संसार के किसी भी पदार्थ को जब सापेक्ष दृष्टि से देखने समझने का हम प्रयत्न करते हैं तब हमें सत्य तत्व का यथार्थ दर्शन होता है।
इसे ही "स्याद्वाद" शब्द से हम संबोधित कर सकते हैं। स्याद्वाद अर्थात सत्यवाद । सत्य के आग्रही को एकांत दृष्टि नहीं रखनी चाहिए। अनेकांत - सापेक्ष - दृष्टि से जगत मात्र को देखने - जानने को उधत आत्मा सरल, स्वच्छ तथा निरागृही होता है।
सामने वाले के किसी भी मंतव्य को वह आग्रह ही बनाकर खंडित नहीं करता परंतु उसमें रहे हुए आपेक्षिक सत्य को और प्रकट करता है। निरपेक्ष एकांत अंश को दूर कर वह स्याद्वादी बनकर सत्य को ग्रहण करता है।
इस दृष्टि से विचार करते हुए ज्ञात होगा कि सत्य संसार के चराचर प्रत्येक पदार्थ में गूढ रूप से रहा हुआ है। केवल उसे देखने के लिए स्वच्छ दृष्टि चाहिए, तभी सत्यतत्व का दर्शन होगा। ऐसी स्वच्छ दृष्टि आने के बाद जीवन में कदागृह, संकुचितता तथा स्वार्थ भावना उत्पन्न नहीं हो सकती।
राग, द्वेष, भय, ईर्ष्या, असुया, मत्सर, काम, क्रोध इत्यादि आंतरिक त्रिपु सत्यवादी की आत्मा पर प्रभाव नहीं जमा पाते। 'मेरे तेरे' का भेद सत्य के ग्राहक को कभी नहीं छू सकता। आकुलता, आवेश और आग्रह तत्वदर्शी में नहीं हो सकते। वाद - विवाद तथा कलह सत्य के जिज्ञासु से दूर रहते हैं। यथार्थ ज्ञाता, दृष्टा बनकर ऐसी आत्मा परमतत्व को प्राप्त करती है। आज आवश्यकता है ऐसे सत्य दर्शन की।

Comments

Popular posts from this blog

निंदा - Ninda

निंदा पत्नी ने पति से कहाँ- टीवी कि आवाज जरा कम कर दो इस आवाज की वजह से पडोस मैं जो पति- पत्नी झगड रहे है वह मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। सबक दुसरो कि निंदा सुनने में बडा आंनद आता है इस लिए गुरु के हितकारी प्रवचन हम सुन नहीं सकते हैं। निंदा करना और सुनना प्रवचन सुनने के लिए बाधक भी है और उसके प्रभाव को नाश करने वाला है।

अनाथ anath

श्रमण अनाथी , नगर के बाहर उपवन में थे युवा अवस्था , भरपूर चैतन्य शक्ति और ऊर्जा का आध्यात्मिक प्रयोग वर्षों की साधना को घंटों में पूर्ण कर रहे थे। एक दिन उपवन में सम्राट श्रेणिक पहुंचे । मुनि के दमकते हुए चेहरे और उभरते हुए यौवन से श्रेणिक विस्मय -विमुग्ध हो उठे। सोचने लगे ,यह सौंदर्य भोग के लिए है या योग के लिए है ? सन्यासी होने का अर्थ यह तो नहीं है कि जीवन के साथ ही अन्याय किया जाए। श्रेणिक मुनि के पास पहुंचे । पूछा ' इस तरह यौवन अवस्था में गृह - त्याग कर सन्यास अपनाने की सार्थकता क्या है ? मुनि ! यह यौवन , भोगों को भोगने के लिए है । तुम उसे क्षीण कर रहे हो । ' मुनि ने कहा , ' नहीं ! मैं ऊर्जा का सदुपयोग कर रहा हूं । वह व्यक्ति भला साधनाओं की पराकाष्ठाओं को कैसे छू पायेगा जो अपना यौवन संसार को सौंपता है और बुढ़ापा परमात्मा को। राजन ! जितनी उर्जा भोग के लिए चाहिए , उससे सौ -गुनी ऊर्जा योग के लिए भी आवश्यक है । ' सम्राट सकपका गया । पूछने लगा ' मुनिवर ! क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं । ' मुनि ने कहा , ' अनाथी । ' ' अनाथी ! बड़ा विचित्र नाम है। मु...

लक्ष्मण को दिया था रावण ने अंतिम संदेश Lakshman ko diya tha ravan ne antim Sandesh

रावण जब मृत्यु शैया पर थे तब राम ने लक्ष्मण से कहा कि, "तुम रावण के पास शीघ्र पहुंचों। उसके पास अमूल्य ज्ञान है, उसे अर्जित करो। उससे जगत के लिए अंतिम संदेश ले आओ।" लक्ष्मण दौड़े। उसने रावण से कहा, "राम रो रहे हैं।" रावण के द्वारा वजह पूछने पर लक्ष्मण ने बताया कि "आपके अंतकाल से व्यथित हुए हैं। मुझे आपके पास अंतिम संदेश प्राप्त करने के लिए भेजा है। बड़े भैया ने कहलवाया है कि "आप अनेक गुणों के भंडार हैं। सीता का अपहरण तो आपकी आकस्मिक (कर्मोदय जनित) भूल थी।" आंख में अश्रु सहित रावण ने कहा कि "मेरे जैसे शत्रु का भी राम गुणकथन करते हैं। इसी लिए राम जगत में भगवान के रूप में पूजे जाते हैं।" अब आपको मेरा अंतिम संदेश यह है, कि" आज की बात कल पर छोड़नी नहीं चाहिए। मेरी इच्छा थी कि मैं स्वर्गगमन के लिए धरती पर सीढी रखूं, जिससे सभी जीव स्वर्गारोहण कर सकें, कोई भी नरक की दिशा में गति न करें, पर वह कार्य अधूरा ही रह गया। मैंने इस काम में विलंब किया और मौत वेग से आगे बढ़ गई। अब अफसोस करने में क्या लाभ। Rich Dad Poor Dad - 20th Anniversa...