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श्रद्धा हो तो ऐसी। Shraddha ho to aisi.

किसी भी विषय को पढ़ लेना एक अलग चीज है, और पढ़ने के उपरांत उसका मनन करना दूसरी चीज है। अधिक या कम कितना भी पढ़ा जाए, किंतु उसके मनन द्वारा उसको उतारा जाए तब ही जीवन सफल होता है।
एक हंस अपने विवेक से दूध और पानी अलग कर लेता है, यही मनन है।
इस मन को अपने में चाहे आत्म दर्शन कह लीजिए चाहे - सम्यक्तव निश्चित: सब एक ही है। व्यवहार अनेक, साध्य एक ही है। उपादान एक हैं निमित्त अनेक।
ग्रहण करने वाला उस तत्व को एक ही बार में ग्रहण कर लेता है। और न ग्रहण करने वाला चाहे एकांत में, जंगल में कितनी साधना करें ग्रहण नहीं कर सकता पोथिया पढ़ने वाला तथा धोटकर पीने वाला पंडित जी उसे ग्रहण न कर सके और एक निरा मूर्ख भी कहो तो दृढ़ श्रद्धा से उसको प्राप्त कर लेता है। यही सम्यक्तव है।
एक त्रिपुंडधारी पंडित जी थे। उनकी वाणी में अद्भुत जादू था। उनकी वाणी के प्रभाव से सिनेमा व्यसनी सिनेमा देखना भूल जाते थे। वे तत्व की बात कहते थे। परंतु क्या स्वयं वे उस तत्व को समझते, या उसके रहस्य तक पहुंच पाते।
मगर वे ऐसी जादू की लकड़ी फेरते थे जिससे सभी मोहित थे। प्रवचन कि बीच-बीच में कहते थे कि राम को भजे सो भव पार हो जावे। प्रवचन नित्य संध्या को होता। श्रोता भी अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर अपनी आत्मा पिपासा को शांत करती।
एक कृषक की पत्नी पतिव्रता थी। अपने पति को भोजन देने उसी मार्ग से गुजर ना उसका नित्यकर्म था। परंतु समय नहीं था कि वह प्रवचन सुने उसे तो अपने काम से फुर्सत नहीं थी। परंतु संयोग की बात देखिए जब वह रास्ते जा रही थी तो पंडित के प्रवचन कान में पहुंच गये कि "राम को भजे सो भवसागर पार होवे।" ये शब्द महिला के कान में पढ़े ही नहीं बल्कि रास्ते में वह गुनगुनाती गई। उन शब्दों से पंडित जी के ऊपर उसे अगाध श्रद्धा हो गई। ना जाने क्या विचार आया जो रास्ते जा रही थी वापस लौटकर पंडित जी के पास आकर कान में बोली आपकी ब्यालु नदी पार अमुक मकान पर होगी। अपना पूरा पता बता कर चली गई।
लेकिन वासा नदी में एकाएक बाढ़ आ गई। कृषक की पत्नी तो श्रद्धा के द्वारा निशचल सम्यक्तव थी ही। आव देखा ना ताव, नदी में गिरी और नदी पार हो गई। और घर जाने पर सभी प्रकार के पकवान बनाए।
काफी समय हो गया मगर पंडित जी उसके घर नहीं पहुंच सके। वह घंटों बाट देखती रही। देखते-देखते शाम हो गई। इतने में पंडित जी आ गए। बोली कब से आपकी बाट देख रही हूं भोजन ठंडा हो चुका है। तो पंडित जी बोले कि कैसे आता नदी में बाढ़ आई हुई थी। बाढ़ का पानी उतरता और नाव मिलती तभी तो आता।
उसने कहा "महाराज मैं तो उसी समय आ गई। आप ही ने तो कहा था कि जो राम को भजे सो भवसागर से पार हो जाए, तो बेचारी छोटी सी नदी की क्या बिसात।
श्रद्धा के साक्षात दर्शन कर पंडित जी की आंखें खुल गई और उन्हें ज्ञात हो गया की -
पोथी पढ़ पढ़ जग हुआ,
पंडित हुआ न कोय,
एक ही अक्षर तत्व का,
पढ़े सो पंडित होय।

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