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अहंकार दीवार है और समर्पण द्वार है।-ahankaar deewar hai aur samarpan dwar hai.

एक छोटी - सी घटना है।

एक चोर प्रतिदिन चोरी करता था ।एक दिन पूरी रात इधर उधर घूमता रहा था,कहीं चोरी का दाव न लगा। सुबह हो चली थी। उदास और निराश वापस घर लौट रहा था। रास्ते में शिवजी का मंदिर पड़ा। सोचा आज तो मुहूर्त ही ठीक नहीं था। चलो शिव जी को प्रणाम कर लूं, हो सकता है कल का मुहूर्त ठीक हो जाए । मंदिर में गया। शिव जी को प्रणाम किया। मंदिर में इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई तो वहां कुछ नहीं था । ऊपर देखा तो शिव जी की मूर्ति पर एक घंटा लटक रहा था। फिर क्या था? चोर ने सोचा - आज तो कुछ मिला नहीं, घर खाली कैसे जाऊं ? और फिर भगवान के दरवाजे से तो कोई खाली नहीं जाता। चलो घंटा ही चुरा लेता हूं ।कुछ तो काम चलेगा। घंटा बहुत ऊंचा था। उसका हाथ उस पर पहुंच नहीं पा रहा था ।अब क्या करें ? हड़बड़ी में उसे कुछ सूझा नहीं तो घंटा चुराने के लिए मूर्ति पर ही चढ गया।

ज्योंही वह मूर्ति पर चढ़ा ,शिव जी प्रकट हो गए। बोले- वत्स !मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं ।घंटा वंटा छोड़ ,आज मुझसे मांग ले तुझे क्या चाहिए? चोर तो घबरा गया ।उसने सोचा - बुरे फंसे। वह क्षमा - याचना करने लगा । शिवजी बोले- घबरा मत ! मैं पुलिस वाला नहीं हूं, तेरे समर्पण से प्रसन्न होकर प्रकट हुआ हूं। मैंने भक्त तो बहुत देखे लेकिन तेरे जैसा भक्त नहीं देखा । मांग ले क्या मांगना है ? शिव जी कह ही रहे थे कि मैं प्रसन्न हूं ,मागं ले क्या मागंना है ? इसी बीच मंदिर का पुजारी आ गया । पुजारी ने मामला देखा तो दंग रह गया । पुजारी चिल्लाया-प्रभु ! आप भी कमाल करते हो में पुजारी हूं, मेरी पूजा से कभी प्रसन्न नहीं हुए, और इस पर प्रसन्न....। यह भक्त नहीं कमबख्त है । चोर है । पूजा के लिए नहीं चोरी के लिए घुसा है । पुजारी तो मैं हूं आपका । प्रसन्न इस पर नहीं ,मुझ पर होइये । वरदान मुझसे मांगने को कहिए । शिवजी बोले - तू चुप रह । पुजारी बोला - भगवन ! चुप कैसे रहूं ? मैं आपको प्रतिदिन पत्र ,पुष्प ,श्रीफल चड़ाता हूं ,नारियल चढ़ता हूं ,दुध चढ़ाता हु ,पैसा चड़ाता हूं ,तब भी आप मुझ पर कभी प्रसन्न नहीं हुए और इसने तो कुछ भी नहीं चढ़ाया । शिवजी बोले - माना कि तू पत्र, पुष्प ,श्रीफल चढ़ाता है लेकिन यह तो खुद ही चढ गया। तो चरणों में अब इसको चढ़ाने को और क्या बचा ? प्रभु के चरणों में अगर कुछ चढ़ाना ही है तो अपने आप को चढ़ाऔ अपने अहंकार को चढ़ाऔ । प्रभु को हम अंहकार से बड़ी भेंट और क्या हो सकती है? आदमी बड़ा बेईमान है सब कुछ चढ़ाने को राजी तो हो जाता है लेकिन अहंकार को चढ़ाने में बड़ी नानूकर दिखाता है। सब चढ़ा कर भी अहंकार बचा ही लेता है और ध्यान रखना - अहंकार की कार में सवार होकर आज तक कोई भी स्वर्ग में प्रभु के राज्य में नहीं पहुंच पाया वहां तो विनम्रता का विमान ही प्रवेश कर पाता है।

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