इलावर्धन नाम का भव्य नगर !
प्राकृतिक सौंदर्य और संपत्ति से भरा पूरा नगर !
नाट्य कला में प्रवीण नटों का आगमन ! नाट्य कला के प्रदर्शन से संपूर्ण नगर वासी आकर्षित हो गए । रूपवती नट - कन्या को देखकर नगर सेठ के पुत्र इलाचीकुमार की आंखों में विकार पैदा हो गया और अंत में मन ही मन नट कन्या से पाणीग्रहण करने का निश्चय कर लिया।
इलाची ने नट कन्या के पिता से कन्या की प्रार्थना की, परंतु नट - कन्या के पिता लंखिकर ने इस शर्त पर कन्यादान स्वीकार किया कि सर्वप्रथम तुम इस नट - विद्या को सिखकर किसी राजा को प्रसन्न करके इनाम प्राप्त करो।
नट - कन्या में मोहित बने इलाची ने सभी शर्तें स्वीकार कर ली और माता-पिता और स्वजनों का विरोध होने पर भी उसने घर का त्याग कर दिया और नटों के समूहों के साथ रहकर नट विद्या सीखने लगा।
नट - कन्या प्राप्ति की तीव्र उत्सुकता के कारण बारह वर्ष में इलाची नाट्य कला में इतना प्रवीण हो गया कि गुलाब के बाग की सुगंध की भांति चारों और दूर-दूर उसकी कीर्ति फैलने लग गई। उसकी नट विद्या के प्रदर्शन को देखने के लिए चारों ओर से मानव समुदाय एकत्रित हो जाने लगा।
अनेक नगरों में अपनी नट विद्या के प्रदर्शन के बाद उसने बेना नदी के किनारे आए हुए नगर में राजा को प्रसन्न करने का निश्चय किया।
बारह - बारह वर्ष की कठोरतम साधना के बाद इलाची के हृदय में तीव्र उत्सुकता थी और पूरा विश्वास था कि आज तो वह राजा को अवश्य खुश करेगा ही और पुरस्कार प्राप्त कर लेगा।
नट - कन्या को भी इलाची पर प्रेम हो गया था। नट - कन्या ने इलाची को अच्छी तरह सुसज्जित किया और स्वयं भी आकर्षक वेशभूषा से सुसज्जित बन नट विद्या प्रदर्शन के लिए तैयार हो गई। आंखों में काजल और भाल पर कुमकुम का तिलक किया।
इलाची और नट - कन्या ने हाथ जोड़कर राजा को प्रणाम किया और नट - विद्या का प्रदर्शन मंगल गीत से शुरू हो गया।
नट - कन्या ने पटह बजाया और इलाची एक ही झटके से डोर पर चड गया। चारों ओर वाह ! वाह ! की ध्वनि सुनाई देने लगी।
मात्र डोर पर नाच ही नहीं, परंतु नट - कन्या द्वारा फेंकी हुई ढाल और तलवार को लेकर आना रणांरण के योद्धा की भांति असि युद्ध का प्रदर्शन भी शुरू कर दिया। और शाबाश ! शाबाश ! की आवाजों से चारों और गगन मंडल गूंज उठा।
इलाची में अद्भुत प्रदर्शन पूर्ण करके राजा को प्रणाम किया और पारितोषिक की याचना की।
राजा ने कहा, 'हे कुमार ! तुम्हारी नट - विद्या के प्रदर्शन को मैं ध्यान पूर्वक ना देख सका, क्योंकि मेरा मन तो राज्य चिंताओं में व्यग्र था, इसीलिए कल पुनः तुम्हारा खेल देखूंगा।
दूसरे दिन पुनः इलाची ने दुगने उत्साह से नाट्य कला का प्रदर्शन किया। आज तक नहीं देखी कलाओं का सुंदरतम प्रदर्शन हुआ। परंतु राजा ने सिरदर्द का बहाना निकाल कर आज भी पारितोषिक नहीं दिया।
तीसरे दिन भी प्रदर्शन हुआ परंतु राजा ने आज भी नया बहाना शोध कर इलाची को इनाम नहीं दिया।
इलाची अब कारण की शोध करने लगा और अंत में उसे ख्याल आ गया कि जिस रूप के राग में उसकी बुद्धि मोहित बनी है, उसी रूप में राजा मोहित बना हुआ है, और उसकी यह इच्छा है कि यदि यह नट नाच करता हुआ भूमि पर गिर पड़े और उसके प्राण पखेरू उड़ जाए तो यह नट - कन्या मुझे मिल सकती है और इसी कारण कोई न कोई बहाना निकाल कर इनाम देने की बात को टालता ही जा रहा है।
नट - कन्या ने पुनः इलाची को यह आश्वासन दिया और कहा कि मैं आपकी ही हूं और आप मेरे हैं। आप निश्चिंत रहें और एक बार पुनः अजमाइश कर लें।
इलाची कुमार ने पुनः दूसरे दिन नाट्य कला का भारी प्रदर्शन किया।
कुमार एक के बाद एक नई - नई कलाओं का प्रदर्शन करता ही जा रहा था और अचानक उसका देह स्तब्ध हो गया। उसकी दृष्टि एक हवेली पर स्थिर हो गई। उसने एक महान आश्चर्य देखा। उस आश्चर्य ने उसके अन्तः पटल खोल दिए। अब उसके हृदय में विवेक का दीप प्रज्वलित हो गया।
डोर पर नाचते हुए इलाची ने देखा कि एक तरुण नवयुवान योगी, जिनके मुख पर ब्रह्मचर्य का दिव्य तेज था और जिनकी आंखों में निर्विकार की परम सौम्यता थी और वे योगी मुनि भिक्षा के लिए हवेली में आए हुए हैं। 'धर्मलाभ' कि आशिष के बाद एक तरुण युवती हाथ में मोदक के थाल को लेकर मुनिश्री को बहोराने के लिए सुसज्जित थी।
नवयौवना बहुत ही भक्ति भाव से मुनिश्री को बहोराने के लिए आग्रह कर रही थी, परंतु मुनिश्री तो नहीं !नहीं ! ही कह रहे थे। मनिश्री की दृष्टि नीचे ही थी। मुनिश्री के जीवन में कंचन और कामिनी के अद्भुत त्याग और उनकी विरक्तता को देखकर इलाची का हृदय परिवर्तित हो गया।
ओहो ! जिस कामिनी के लिए मैंने मां का त्याग किया, बाप का त्याग किया, मां के प्यार और पिता की आज्ञा का तिरस्कार किया, घर छोड़ा, गांव छोड़ा, व्यापार छोड़ा, अरे जिस कामिनी के प्रति मुझे इतनी आसक्ती,उसी के प्रति विरक्ति के दर्शन ! ओहो ! यह राजा भी इस कामिनी में आसक्त होकर मुझे मारने का प्रयास कर रहा है।
धिक्कार है, मेरे इस हाड चाम से मंढे कामिनी के प्रति रहे भाव को !…. इसी भावना में चढ़ते - चढ़ते जातिस्मरणज्ञान हो गया और इलाची का मन भोग सुखों से विरक्त हो गया। वह शुभ - ध्यान की श्रेणी पर चढ़ता ही गया और कुछ ही समय बाद विरक्त में से वितराग बन गया।
इलाची कुमार के हृदय में से अज्ञान का पर्दा हट गया। वे सर्वज्ञ सर्वदर्शी बन गये। देवताओं ने तत्काल पुष्पवृष्टि की और इंद्र प्रदत्त साधु वेश को धारण कर इलाची कुमार अब इलाची मुनि बन गये।
अपनी पवित्र देशना से अनेकों का उद्धार करते हुए पृथ्वी तल को पावन करने लगे और अंत में मुक्ति पथ के पथिक बन गयें।
धन्य है, उन महामुनि विरक्तता को !
प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...
I had participated in a stage play when I had played the role of small Elachikumar...
ReplyDeleteTysm for refreshing my memories...
धन्यवाद, मुझे अति प्रसन्नता हुई की मैं आपकी पुरानी यादों को ताजा कर सका।
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