जीवन पूरा करने के लिए या दिन खींचने के लिए जीवन जीने वाले व्यक्ति ने अपने जीवन को पूरी तरह समझा ही नहीं है। उसने अपनी जीवन की कीमत समझी ही नहीं है। मानव संसार के सब अन्य प्राणियों की अपेक्षा कुछ विशेषता वाला प्राणी है। उसका जीवन अन्य सबसे ऊंचा है। इस विषय में कोई मतभेद नहीं है। मानव जीवन में बाल्यकाल पराधीन और अज्ञान दशा में भी जाता है, यह बात उस समय समझ में नहीं आती है। तदापि उस बाल्यकाल में निर्दोष सरलता तथा हृदय की स्वच्छता दृष्टिगत होती है।
बाल्यकाल बीतने के बाद युवक बने हुए मानव में अनेक प्रकार की हवाओं का प्रवेश होता है। सरलता लगभग समाप्त हो जाती है। स्वच्छंदता, उद्धंतता, दंभ कृत्रिमता आदि दूषण मानव के जीवन में अपना स्थान बना लेते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि प्रोढ या वृद्ध अवस्था आने पर भी वह मानव अपने जीवन में प्रविष्ट हो चुके उन अनिष्टों के सामने निरूपाय बनकर अपने जीवन को बर्बाद कर लेता है।
आज अन्य जीवों की अपेक्षा ऐसे मनुष्यों का भार संसार में बढ़ रहा है। मानव का त्रास, उसके पाप, उसके अन्याय, उसके असत्य के आचरण और दंभ ने पृथ्वी को अत्यंत भारभूत बना दिया है। जंगल के जंगली श्र्वापद, जहरीले जानवर और हिंसक पशु जगत के लिए इतने भयंकर नहीं है जितना जंगली जीवन जीने वाला निर्लज्ज क्रूर मानव भयंकर त्रासरूप बना है।
मानव के जीवन में विशेष रूप से दो पाप सीमातीत रूप में बढ़ें हुए।वे हैं - विलास और दंभ । दंभ, घमंड, अभिमान या अपनी महत्ता का नशा मानव को बेभान बनाता है। अपने आपको अच्छा कह लाने के लिए, अच्छा दिखलाने के लिए मानव आज दिन - रात खूब - कपट और षड़यंत्र का सहारा ले रहा है। उसे अच्छा बनने की अपेक्षा अच्छा कह लाने में मजा आता है। उसे पैसा भी इसीलिए चाहिए। अपने मान,सम्मान, शोभा, आडंबर और शान के लिए उसे लाखों का धन चाहिए। करोड़ों की दौलत चाहिए। मान - शान के लिए लाखों का खर्च भी हंसते हुए करने को तत्पर रहता है, इसमें उसे कुशलता, बुद्धिमत्ता और व्यवहारिकता नजर आती है।
विलास, दम्भ - घमंड और आत्म - प्रशंसा का साथी है। विलास के पीछे पैसे का पानी करने में वह मानव चूकता नहीं है। जीवन के इस नकली नाटक को वह सभ्यता के नाम से पुकारता है। आज जबकि बेकारी, आर्थिक तंगी और मुद्रा की कमी तथा बाजारों की मंदी चारों और फैल रही है, तब भी मानव को अपने विलास, वैभव, रागरंग, ठाट - बाट, शान - शौकत में कमी करना नहीं सुहाता। इसीलिए कहीं से भी पैसा प्राप्त करने का कीड़ा उसके दिमाग में कल - बलता रहता है। इस प्रकार दंभ और विलास ने मानव के जीवन को अध: पतन गहरे गर्त में धकेल दिया है।
यह परिस्थिति मानव को विषचक्र की तरफ घुमा रही है। जीवन की स्वस्थता, समाधि, शांति और समृद्धि का सर्वनाश होता जा रहा है। इसीलिए इसमें से बचने का उपाय सदा काल के लिए एक ही है और वह है जीवन को सात्विक और सादा बनाना। मनुष्य को चाहिए कि वह संयमी बनकर जीवन में सादगी को ताना - बाना की तरह बून दे। खान - पान और व्यवहार में तथा रीति - रिवाज में फिजूल खर्च ना करें, आडंबर,दंभ, दिखावा शोभा आदि के मोह को कम करें, जीवन की आवश्यकताओं को यथाशक्ति कम करें, ऐसा करने से पाप भावना घटेगी। अनीति, छल, कूट - कपट कम होंगे। जीवन संतोषी और सुखी बनेगा तथा आत्मा का भार हल्का होगा।
संसार में सुख पूर्वक, समाधि एवं स्वस्थता से जीवन जीने के लिए, जीवन को गौरवमय रीति से जीने के लिए हमेशा यह ध्यान में रख लेना चाहिए कि जीवन में सात्विकता और सादगी का समावेश हो ही।
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