यह सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला महामंत्र है। आत्मा शोधन हेतु होते हुए भी नित्य जाप करने वाले के रोग,शोक,आदि, व्याधि आदि सभी बाधाएं दूर हो जाती है, पवित्र, अपवित्र, रोगी, दुखी, सुखी आदि किसी भी अवस्था में इस महामंत्र के जाप करने से समस्त पाप भस्म हो जाते हैं तथा अंदर से व बाहर से मन पवित्र हो जाता है। यह समस्त विघ्नों को दूर करने वाला तथा समस्त मंगलों में प्रथम है। किसी भी कार्य के आदि में इसके स्मरण करने से वह कार्य निर्विघ्न तथा पूर्ण हो जाता है।
त्रियंच, पशु ,पक्षी जो मांसाहारी है जैसे सर्प जीवन में हजारों तरह के पाप करते हैं, अनेक प्राणियों की हिंसा करते हैं मांसाहारी होते हैं तथा उनमें क्रोध, मान, माया, लोभ कषायों की तीव्रता होती है, फिर भी अंतिम समय में किसी दयालु द्वारा णमोकार मंत्र का श्रवण कराने मात्र उस त्रियंच पर्याय का त्याग कर स्वर्ग देव गति को प्राप्त होते हैं।
णमोकार मंत्र के एक अक्षर का भाव सहित स्मरण करने से सात साल तक भोगे जाने वाले पापों का नाश हो जाता है और समस्त मंत्र का भाव सहित जाप करने तथा विधि पूर्वक स्मरण करने पर अभागा प्राणी स्वर्गोदी सुखों को प्राप्त करता है।
जो व्यक्ति एकाग्र मन से जाप करता है, उसे एक उपवास का फल होता है।
नया साधक जब-जब ध्यान का अभ्यास करता है तो उसके सामने सबसे बड़ी कठिनाइयां आती है कि अन्य समय जिन सड़ी गली गंदगी एवं घिनौनी बातों की उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वे उस समय याद आती है और उससे वह घबरा जाता है। इसका मुख्य कारण यही है कि, जिसका वह ध्यान करना चाहता है उसमें मन अभ्यस्त नहीं है। इसके लिए आचार्यों ने धार्मिक गणित से गुत्थियों को सलझाने व मन को स्थिर करने की प्रक्रिया बतलाई। धार्मिक गणित द्वारा सतत अभ्यास से यह आत्म चिंतन में लग जाता है। मन की एकाग्रता के लिए अनु पूर्वी के द्वारा इस साधना में जुट जावें ताकि जीवन का कल्याण हो सके।
आनु पूर्वी जपने का फल
आनु पूर्वी प्रतिदिन जपिए, चंचल मन स्थिर हो जावे।
छह माही तप का फल होवे, पाप - पंक सब धुल जावे।
मंत्रराज नवकार हृदय में, शांति सुधारस बरसाता।
लौकिक जीवन सुखमय करके अजर अमर पद पहुंचाता।
जिनवाणी का सार है, मंत्रराज नवकार !
भाव - सहित जपिए सदा, यही साधना सार !!
प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...
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