दुःख, आपत्ति और कठिनाइयां ही आपको चिरकाल तक यौवन बनाए रख सकती हैं। Dukh, aapatti aur kathinaiyan hi aapko chirkal Tak yovan banae rakh sakti hai.
आपत्ति या संपत्ति, आनंद या उद्वेग, सुख या दु:ख संसार की यह सब परिस्थिति धूप और छाया का खेल मात्र है। इन सब परिस्थितियों में आत्मा के स्वास्थ्य, संतोष और शांति को जो समभाव पूर्वक कायम रख सकते हैं, वे ही जीवन के मर्म को पा सकते हैं, यह सहज ही कहा जा सकता है।
मानव महान है परंतु इसका यह नहीं है की इसे जीवन में ऐश - आराम, सुख - सुविधा या आनंद प्रमोद के साधन खूब मिलते हैं और उन्हें वह भोग सकता है। मानव की महत्ता तो सचमुच दु:ख, आपत्तियों और प्रतिकूलताओं के दुर्गम पहाड़ों के बीच भी अपने आत्मतेज को बनाए रखने में ही रही हुई है। इसीलिए मानव को महान् गिना गया है।
कर्माधीन संसार में कर्मजन्य विषमताओं को हंसते-हंसते सहन कर लेने की शक्ति जिसमें हैं, वही संसार को जीतकर जीवन को अध्र्वगामी बना सकता है। जो स्वयं को सुखों का स्वामी मानकर दु:खों और कठिनाइयों के महासागर को जो अकेला अदीनमन से तैरने को सदा सज्जित रहता है वही आत्मा महत्ता के महान शिखर पर आरूढ़ हो सकता है।
जब आप दु:ख, मुसीबत और प्रतिकूल संयोगों से चारों और धिरे होते हैं तभी आपके जीवन की सच्ची कसौटी होती है। सुख तो जीवन की जरा है। जैसे वृद्धावस्था में मानव उत्साह, स्फूर्ति या शक्ति हीन बन जाता है, वैसी ही दशा सुख के समय मानव मन की होती है। ऐसी स्थिति में मानव प्राय: ऐश - आराम और वैभव में मस्त बनकर अपने आत्मतेज, सत्व और प्रभाव को खोकर अकाल में वृद्ध बन जाता है।
जबकि दु:ख भोगने की शक्ति, सामर्थ्य ही जीवन की जवानी है। दु:ख के समय आत्मा की गुप्त शक्तियों को विकसित होने का अवसर मिलता है। जीवन के इस यौवन काल में मानव का सत्व कसौटी पर चढ़ता है। जीवन का स्वर्ण ऐसे समय में ही परखा जाता है। कनक और कथीर की परीक्षा ऐसे अवसर पर ही होती है।
दु:ख, आपत्ति या कठिनाइयों में निराश नहीं होना चाहिए। कठिनाइयां पुरुष की शोभा है, आपत्ति यौवन का अलंकार है परंतु इसमें पूर्वकालीन दुष्कर्मो के प्रति चुभन होनी चाहिए। दु:ख, पूर्वकृत दुष्कृत्य का परिणाम है, ऐसा मानकर बुद्धिमान व्यक्ति को उसे धीरता के साथ सहन करना चाहिए।
आपत्तियों के तूफान में जो स्वस्थ रहकर स्थैर्य और धैर्य को कायम रख सकता है वह जीवन में कदापि पिछड़ नहीं सकता। ऐसा व्यक्ति जीवन में कदापि पराजित नहीं होता। जो दु:खों से डरता है, वह कायर बनकर आत्मभान को भुला देता है।
संसार के महान पुरुषों के जीवन का अभ्यास करने पर सहज ही समझा जा सकता है कि महापुरुषों ने सदा ही दु:खों का स्वागत किया है। आपत्तियों को वधाया है, उपसर्ग - परिषहों या कठिनाइयों को फूलमाला की तरह सन्मान दिया है। तभी वे आत्माएं महान् बन पाई हैं। जीवन को उन्नत बनाकर वे आत्मसिद्धि पाने में समर्थ बन सके हैं।
जब भी आप परेशानी में हों और कोई पूछे कि 'कैसे हो ?'उस समय प्रसन्न मुख से धैर्य के साथ यही कहिए कि - दु:ख का क्या काम ? आनंद ही आनंद है। आपत्तियां या दु:ख स्वयं दु:खरूप नहीं है उन से घबराकर कायर बन जाना ही दु:ख है। दु:ख में जो दीन बन जाता है वही अपना कुछ खोता है, मेरे पास खोने को कुछ नहीं है क्योंकि दु:ख को धीरता पूर्वक सहन कर लेने की शक्ति मुझ में है। अतएव विजेता के आनंद का अनुभव कर रहा हूं।'
अपने भूतकाल में जो कुछ अर्जित किया है उसे भोगने का सुअवसर आपके लिए आनंद का दिन होना चाहिए। उसे उत्साह के साथ पर्व की तरह मनाने में ही जीवन की महत्ता है। इसी में जीवन को जीने की कला है।
आपत्तियों के तूफान में जो सुख पूर्वक रह सकता है, वही जीवन के यौवन को चिरकाल तक टिकाए रख सकता है।
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मानव महान है परंतु इसका यह नहीं है की इसे जीवन में ऐश - आराम, सुख - सुविधा या आनंद प्रमोद के साधन खूब मिलते हैं और उन्हें वह भोग सकता है। मानव की महत्ता तो सचमुच दु:ख, आपत्तियों और प्रतिकूलताओं के दुर्गम पहाड़ों के बीच भी अपने आत्मतेज को बनाए रखने में ही रही हुई है। इसीलिए मानव को महान् गिना गया है।
कर्माधीन संसार में कर्मजन्य विषमताओं को हंसते-हंसते सहन कर लेने की शक्ति जिसमें हैं, वही संसार को जीतकर जीवन को अध्र्वगामी बना सकता है। जो स्वयं को सुखों का स्वामी मानकर दु:खों और कठिनाइयों के महासागर को जो अकेला अदीनमन से तैरने को सदा सज्जित रहता है वही आत्मा महत्ता के महान शिखर पर आरूढ़ हो सकता है।
जब आप दु:ख, मुसीबत और प्रतिकूल संयोगों से चारों और धिरे होते हैं तभी आपके जीवन की सच्ची कसौटी होती है। सुख तो जीवन की जरा है। जैसे वृद्धावस्था में मानव उत्साह, स्फूर्ति या शक्ति हीन बन जाता है, वैसी ही दशा सुख के समय मानव मन की होती है। ऐसी स्थिति में मानव प्राय: ऐश - आराम और वैभव में मस्त बनकर अपने आत्मतेज, सत्व और प्रभाव को खोकर अकाल में वृद्ध बन जाता है।
जबकि दु:ख भोगने की शक्ति, सामर्थ्य ही जीवन की जवानी है। दु:ख के समय आत्मा की गुप्त शक्तियों को विकसित होने का अवसर मिलता है। जीवन के इस यौवन काल में मानव का सत्व कसौटी पर चढ़ता है। जीवन का स्वर्ण ऐसे समय में ही परखा जाता है। कनक और कथीर की परीक्षा ऐसे अवसर पर ही होती है।
दु:ख, आपत्ति या कठिनाइयों में निराश नहीं होना चाहिए। कठिनाइयां पुरुष की शोभा है, आपत्ति यौवन का अलंकार है परंतु इसमें पूर्वकालीन दुष्कर्मो के प्रति चुभन होनी चाहिए। दु:ख, पूर्वकृत दुष्कृत्य का परिणाम है, ऐसा मानकर बुद्धिमान व्यक्ति को उसे धीरता के साथ सहन करना चाहिए।
आपत्तियों के तूफान में जो स्वस्थ रहकर स्थैर्य और धैर्य को कायम रख सकता है वह जीवन में कदापि पिछड़ नहीं सकता। ऐसा व्यक्ति जीवन में कदापि पराजित नहीं होता। जो दु:खों से डरता है, वह कायर बनकर आत्मभान को भुला देता है।
संसार के महान पुरुषों के जीवन का अभ्यास करने पर सहज ही समझा जा सकता है कि महापुरुषों ने सदा ही दु:खों का स्वागत किया है। आपत्तियों को वधाया है, उपसर्ग - परिषहों या कठिनाइयों को फूलमाला की तरह सन्मान दिया है। तभी वे आत्माएं महान् बन पाई हैं। जीवन को उन्नत बनाकर वे आत्मसिद्धि पाने में समर्थ बन सके हैं।
जब भी आप परेशानी में हों और कोई पूछे कि 'कैसे हो ?'उस समय प्रसन्न मुख से धैर्य के साथ यही कहिए कि - दु:ख का क्या काम ? आनंद ही आनंद है। आपत्तियां या दु:ख स्वयं दु:खरूप नहीं है उन से घबराकर कायर बन जाना ही दु:ख है। दु:ख में जो दीन बन जाता है वही अपना कुछ खोता है, मेरे पास खोने को कुछ नहीं है क्योंकि दु:ख को धीरता पूर्वक सहन कर लेने की शक्ति मुझ में है। अतएव विजेता के आनंद का अनुभव कर रहा हूं।'
अपने भूतकाल में जो कुछ अर्जित किया है उसे भोगने का सुअवसर आपके लिए आनंद का दिन होना चाहिए। उसे उत्साह के साथ पर्व की तरह मनाने में ही जीवन की महत्ता है। इसी में जीवन को जीने की कला है।
आपत्तियों के तूफान में जो सुख पूर्वक रह सकता है, वही जीवन के यौवन को चिरकाल तक टिकाए रख सकता है।
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