Skip to main content

ऐसा क्‍यों है कि सर्वाधिक लोग दु:ख और पीड़ा का ही जीवन बनते हैं ? Aisa kyon hai ki sarvadhik log dukh aur pida Ka hi jivan bante Hain ?


प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन साथ ही बहुत ही नाजुक भी है। पहली बात समझने की यह है, कि जीवन बहुत ही विरोधाभासी है और उसके कारण बहुत सी चीजें घटित होती हैं।
विकल्प दो ही है !





मनुष्य स्वर्ग में हो सकता है या नरक में। तीसरी कोई संभावना नहीं है। या तो तुम गहन दु:ख का जीवन चुन सकते हो या दु:ख—शून्य प्रगाढ़ आनंद का जीवन चुन सकते हो।






ये दो ही विकल्प हैं, ये दो ही संभावनाएं हैं, ये दो ही द्वार हैं—जीने के दो ढंग।






लेकिन तब स्वभावत: प्रश्न उठता है कि मनुष्य दु:ख का जीवन क्यों चुनता है ?
दु:ख मनुष्य का चुनाव नहीं है, चुनाव तो वह सदा आनंद का ही करता है। लेकिन यहीं विरोधाभास खड़ा हो जाता है।






विरोधाभास यह है कि अगर तुम आनंद चाहते हो तो तुम्हें दु:ख मिलेगा, क्योंकि आनंद की पहली शर्त चुनाव—रहितता है। यही समस्या है।






अगर तुम आनंद का चुनाव करते हो तो तुम्हें दु:ख में जीना पड़ेगा। और अगर तुम कोई चुनाव नहीं करते हो, सिर्फ साक्षी रहते हो, चुनाव—रहित साक्षी, तो तुम आनंद में होगे।
तो प्रश्न यह नहीं है कि आनंद और दु:ख के बीच चुनाव करना है, प्रश्न यह है कि चुनाव और अचुनाव के बीच चुनाव करना है। लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब भी तुम चुनाव करते हो तो तुम सदा दु:ख ही पाते हो?






चुनाव विभाजन करता है, बांटता है। चुनाव का मतलब है कि तुम जीवन से कुछ को इनकार करते हो, कुछ को अलग करते हो। चुनाव का अर्थ है कि तुम समग्र जीवन को नहीं स्वीकार करते हो; उसमें से कुछ को स्वीकार करते हो और कुछ को इनकार करते हो।





लेकिन जीवन का विभाजन संभव नहीं है, जब तुम बांटकर कुछ को चुनते हो तो जिसे तुम इनकार करते हो वह तुम्हारे पास बार—बार लौट आता है। जीवन को खंडों में नहीं बांटा जा सकता, वह अखंड है। और इसलिए जिस हिस्से को तुम इनकार करते हो, वह इनकार करने से ही शक्तिशाली हो जाता है। और सच्चाई यह है कि तुम उससे भयभीत रहते हो।






जीवन के किसी भी हिस्से को इनकार नहीं किया जा सकता, छोड़ा नहीं जा सकता।
जीवन समग्र है, यह एक बात। और दूसरी बात कि जीवन सतत परिवर्तन है, सतत बदलता है। ये बुनियादी सत्य हैं। एक कि जीवन के खंड नहीं किए जा सकते और दूसरा कि कुछ भी स्थायी नहीं है, कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है।






तो जब तुम कहते हो कि मैं दु:ख नहीं लूंगा, मैं तो सदा आनंद ही लूंगा, तो तुम सुख से चिपकोगे। और जब तुम किसी चीज से चिपकते हो तो तुम चाहते हो कि वह हमेशा बनी रहे। लेकिन जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है, कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है। जीवन एक प्रवाह है। तो जब तुम सुख का आग्रह करते हो, सुख से चिपकते हो, तो तुम इस आग्रह के कारण ही दु:ख को बुलावा दे रहे हो, दु:ख का निर्माण कर रहे हो। क्योंकि यह सुख तो जाने वाला है, यहां कुछ भी स्थायी नहीं है।






यह तो एक नदी है, सतत बह रही है, भागी जा रही है। और जब तुम नदी से चिपकते हो तो तुम ऐसी स्थिति का निर्माण कर रहे हो जिसमें देर - सबेर निराशा ही हाथ आएगी। नदी तो आगे बढ़ जाएगी, देर - सबेर तुम पाओगे कि नदी तो जा चुकी है, तुम्हारे पास नहीं है। तुम पाओगे कि तुम्हारे हाथ खाली हैं और तुम हाथ मलते रह गये हो, सिर धुन रहे हो।






अगर तुम सुख को पकड़कर रखना चाहते हो तो तुम इस आग्रह के कारण ही सुख को भी नहीं भोग पाओगे। उसके जाने पर तो रोओगे ही, कभी भी तुम उसका सुख नहीं ले पाओगे, क्योंकि यह भय तो निरंतर बना ही हुआ है कि कहीं यह चला न जाए।






पहली बात कि जीवन को खंडों में नहीं बांटा जा सकता है। और चुनाव करने के लिए बांटना जरूरी है, अन्यथा चुनाव कैसे करोगे ? और फिर तुम जिसे चुनोगे वह रुकने वाला नहीं है -देर - सबेर वह जाने वाला है। और तब वह हिस्सा सामने आएगा जिसको तुमने इनकार किया है, तुम उससे बच नहीं सकते। तुम यह नहीं कह सकते कि दिन तो मैं लूंगा, लेकिन रात नहीं लूंगा, तुम यह नहीं कह सकते कि मैं श्वास लूंगा, लेकिन छोडूंगा नहीं, मैं उसे बाहर नहीं जाने दूंगा।






जीवन विरोधों से बना है, वह विरोधी स्वरों से बना हुआ संगीत है। श्वास भीतर आती है, श्वास बाहर जाती है, और इन दो विरोधों के बीच, उनके कारण ही, तुम जीवित हो। वैसे ही दु:ख है और सुख है। सुख आने वाली श्वास की भांति है; दु:ख जाने वाली श्वास की भांति है। या सुख - दु:ख, दिन - रात जैसे हैं। विरोधी स्वरों का संगीत है जीवन। और तुम यह नहीं कह सकते कि मैं सुख के साथ ही रहूंगा, दु:ख के साथ नहीं रहूंगा। और अगर तुम यह दृष्टिकोण रखते हो तो तुम और गहरे दु:ख में गिरोगे। यही विरोधाभास है।
स्मरण रहे,






 कोई आदमी दु:ख नहीं चुनता है, दु:ख नहीं चाहता है। तुम पूछते हो, क्यों आदमी दु:ख का चुनाव करता है। किसी ने भी दु:ख का चुनाव नहीं किया है। तुमने तो सुखी रहने का चुनाव किया है, दु:खी रहने का नहीं। और तुमने सुखी रहने का चुनाव दृढ़ता के साथ किया है। सुखी रहने के लिए तुम सारे प्रयत्न करते हो, उसके लिए तुम कुछ भी उठा नहीं रखते हो। लेकिन विडंबना यह है कि इसी कारण तुम दु:खी हो, इसी कारण तुम सुखी नहीं हो। फिर किया क्या जाए ?






स्मरण रखो कि जीवन अखंड है, जीवन समग्र है। इसमें चुनाव संभव नहीं है। पूरे जीवन को स्वीकार करना है। पूरे जीवन को जीना है। सुख के क्षण आएंगे और दु:ख के भी क्षण आएंगे, और दोनों को अंगीकार करना है। चुनाव व्यर्थ है, क्योंकि जीवन दोनों है। अन्यथा लयबद्धता खो जाएगी, और इस लयबद्धता के बिना जीवन नहीं चल सकता है।
ओशो
तंत्र सूत्र.…….. 






Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

जिनके साथ हम रहेंगे वैसे ही बन जाएंगे। Jinke sath ham rahenge vaise hi ban jaenge

प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...

बड़प्पन उम्र से नहीं अच्छे कर्मों से सिद्ध होता है badappan umra se nahin acche karmon se siddh hota hai

बड़ा तो गधा भी हो जाता है और कुत्ता भी हो जाता है, गुंडा भी हो जाता है और दुर्जन भी हो जाता है, चोर भी हो जाता है और व्यभिचारी भी हो जाता है। मात्र समय व्यतीत होता है और यह सभी बड़े हो जाते हैं। परंतु, यह " बड़प्पन " न तो गौरवप्रद बनता है और न ही किसी के लिए आलंबन रूप बनता है। परंतु…… एक बड़प्पन ऐसा है कि जिसका संबंध समय के साथ नहीं, पर सत्कार्यों के साथ है। उम्र के साथ नहीं, पर विवेक के साथ है। यह बड़प्पन गौरवप्रद भी बनता है और अनेकों के लिए आलंबन रूप भी बनता है। एक सनातन सत्य हमें आंखों के सामने रखना है और वह यह है कि   जिंदगी की लंबाई बढ़ाने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते लेकिन हमारे हाथ में यह दो चीजें हैं - जिंदगी की चौड़ाई हम बढ़ा सकते हैं, जिंदगी की गहराई हम बढ़ा सकते हैं। जीवन को यदि हम सत्कार्यों से महका रहे हैं तो हमारे जीवन की चौड़ाई बढ़ रही है और उन सत्कार्यों के फल - स्वरुप यदि हमारे मन की प्रसन्नता बनी रहती है तो हमारे जीवन की गहराई बढ़ रही है। पर कैसी दयनीय दशा है हमारी ? जीवन की इस जिस लंबाई को बढ़ाने में स्वयं परमात्मा को भी सफलता नहीं मिली उस लंबाई को बढ़ाने ...

कल की चिंता में वर्तमान समय को व्यर्थ ना गवाएं cal ki chinta mein vartman samay ko vyarth Na gavan

" रात गई बात गई " जो इस भाव में जीता है उसके पास भला तनाव कहां से आएगा ? रात की बात को सुबह लाना और सुबह की बात को रात तक खींच कर ले जाना ही तो चिंता का बसेरा बसाना है । अगर आप जी सकें तो वर्तमान में जीने की कोशिश कीजिए। जो जैसा मिला है उसे जिया जाए‌। जैसे आप अपने घर में खूंटियों पर कपड़े लटकाते हैं वैसे ही उन खूंटियों पर अतीत की यादें लटका दें, भविष्य की कल्पनाओं को लटका दें और आप वर्तमान में जिएं। जो वर्तमान में जीता है जैसी व्यवस्था मिलती है उसे स्वीकार कर लेता है, वह चिंतामुक्त है। कोठरी का भी स्वागत करो और कोठी का भी स्वागत करो। वर्तमान में जीते हुए प्रकृति के सानिध्य में रहने की कोशिश करें। प्रकृति जो कर देती है वही ठीक है। चिंता करने से जीवन के संयोग नहीं बदलते। चिंताओं से समस्या का समाधान भी नहीं निकला करता। अच्छा होगा चिंता करने के बजाय चिंतन करें, निर्णय लें तदनुसार कार्य करें, परिणाम जो आए उसका स्वागत करें। एक अन्य काम और करें कि जीवन में घटी दुर्घटनाओं को अधिक तवज्जो ना दें। उठा-पटक हर किसी की जिंदगी में होती है तभी तो आदमी को "समझ" आती है। लेकिन जो ब...