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दूसरों को जो पीड़ा नहीं देता वही सच्चे अर्थ में सज्जन है dusron ko Jo pida Nahin deta vahi sacche arth mein sajan hai


मेरे पास यदि संपत्ति हो तो मैं श्रीमंत हूं,
बल हो तो मैं बलवान हूं,
कला हो तो मैं कलाकार हूं,
बुद्धि हो तो मैं बुद्धिमान हूं,
होशियारी हो तो मैं चालाक हूं,
सत्ता हो तो मैं सत्ताधीश हूं,
परंतु…….
सद्गुण हो तो मैं सज्जन ही हूं यह जरूरी नहीं है। मायावी के पास भी सद्गुण हो सकते हैं। मेरे जीवन में सत्कार्य हो तो मैं सज्जन ही हूं यह जरूरी नहीं है।
गुंडे के जीवन में भी सत्कार्य हो सकते हैं। परंतु…..
दूसरों को यदि मैं पीड़ा नहीं देता, परेशान नहीं करता, दु:ख नहीं पहुंचाता तो मैं सज्जन हूं ही।
क्रिकेट जगत की एक महत्वपूर्ण बात तुम जानते हो ?
सबसे अच्छा खेलने वाला, खिलाड़ी बन सकता है, पर जरूरी नहीं है वह कैप्टन भी बन सके। कैप्टन तो वही बन सकता है जो सभी खिलाड़ियों को अच्छा खिलवा सकता है।
संपत्ति, सत्ता या सौंदर्य तुम्हारे पास अधिक हो मात्र इससे तुम सज्जन नहीं बन सकते। सबको सुख देते रहने की, सबको प्रसन्न बनाते रहने की, सबको शांति देते रहने की तुम्हारी वृत्ति - प्रवृत्ति ही तुम्हें सज्जन बना सकती है।
इस दुनिया में चार प्रकार के जीव हैं।
दूसरों को सुख देकर जो प्रसन्नता का अनुभव करते हैं वह प्रथम नंबर के उत्तम जीव हैं।
दूसरों को सुखी देखकर जो प्रसन्नता का अनुभव करते हैं वे दूसरे नंबर के मध्यम जीव हैं।
दूसरों को दु:खी देखकर जिनके हृदय में प्रसन्नता की अनुभूति होती है वह तीसरे नंबर के अधम जीव हैं,
और
दूसरों को दु:खी करके अपने हृदय में जो प्रसन्नता का अनुभव करते हैं वह चौथे नंबर के अधमाधम जीव हैं।
  " स्थिति में से उस उपस्थिति निकल जाए तो शेष बचता एकांत…….
रकम में से रकम निकल जाए तो शेष बचता है शून्य, पर ऐसा क्यों होता है कि मानव में से मानव निकल जाए तो शेष बचता है राक्षस ?"
इतना ही कहूंगा कि हिरण, सिंह न भी बने  तो भी सियार तो नहीं ही बन जाता,
पर हम ?
यदि सज्जन न बन पाए तो राक्षस बन कर ही रहेंगे।


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