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ज्ञान का अंतिम लक्ष्य चरित्र निर्माण ही होना चाहिए Gyan ka antim Lakshya Charitra Nirman hi hona chahie


भोजन का लक्ष्य, क्षुधाशांति।
पानी पीने का लक्ष्य, तृषाशांति।
दवासेवन का लक्ष्य, रोगशांति।
बातचीत - चर्चा का लक्ष्य, कलहशांति। व्यापार का लक्ष्य, फायदे की प्राप्ति।
संबंधों का लक्ष्य, प्रेम और आश्वासन की अनुभूति।
पर….. ज्ञान का लक्ष्य? चरित्र का निर्माण।
अलग-अलग दृष्टिकोण से इसके अलग-अलग उत्तर दिए जा सकते हैं, पर चरित्र निर्माण की सरलता से सहज समझ में आ जाए ऐसी व्याख्या करनी हो तो यह कह सकते हैं कि,
अंधेरे में स्वयं के सामने और उजाले में शिष्टपुरुषों के सामने लेशमात्र अपराध भाव के बिना प्रसन्नतापूर्वक बहादुरी से खड़े रह सकें ऐसी जीवन पद्धति का नाम है चरित्र।
इस व्याख्या के आधार पर हमें आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है। ऐसा निंद आचरण - जिसकी भले ही किसी को जानकारी न हो - हमारे जीवन में नहीं है ना जो अंतःकरण की अदालत में खुद को अपराधी साबित करता हो ?
ऐसा कोई निंद आचरण हमारे जीवन में तो नहीं है ना कि जो शिष्टपुरुषों की नजरों में गिरा देता हो ?
खुद के पास सम्यक् समझ होने का यदि हमारा दावा है, हमारे पास जो भी समझ है  उसे यदि हम " ज्ञान " मान बैठे हैं तो चरित्रनिर्माण का लक्ष्य, उस की कसौटी है।
मेरे ज्ञान से मुझे सामने वाले को प्रभावित नहीं करना है बल्कि स्वयं को प्रक्षालित करना है। मेरे ज्ञान से मुझे मात्र संपत्ति अर्जित नहीं करते रहना है, सद्गुणों को विकसित करते रहना है। मेरे ज्ञान से मुझे अंहकार के आसमान में उड़ते नहीं रहना है बल्कि नम्रता के मानसरोवर में डुबकियां लगाते रहना है।
किसी अज्ञात शायर ने अपनी पंक्तियों के माध्यम से ईश्वर से बहुत सुंदर प्रार्थना की है - नहीं मेरी कोई याचना की पहुंचा दो मंजिल पर, केवल यह विश्वास दिला दो कि मैं सही दिशा में हूं।"
" चरित्र निर्माण, यही मेरा लक्ष्य है "
हृदय के कोने‌ - कोने में यह ध्वनि गुंजायमान कर दें।


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