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इंद्रियां शत्रु है, पर उन्हें जीत लो तो मित्र हैं indriya shatru hai per unhen jeet lo to Mitra Hain


युद्ध के मैदान में खूंखार दुश्मन पर विजय प्राप्त कर तुम उसे पराजित कर सकते हो, पर उसे मित्र तो नहीं ही बना सकते।
कातिल एक जहरीले सांप को मंत्रप्रयोग या किसी अन्य उपाय से तुम वश में कर सकते हो, पर मित्र तो नहीं ही बना सकते हैं।
परंतु….
इंद्रियां ऐसी हैं कि जीने तुमने मनमाफिक करने की खुली छूट दे दी तो वे दुश्मन बनकर तुम्हारी हालत बिगाड़ देती है और यदि तुमने उन्हें वश में कर लिया तो मित्र बनकर वे तुम्हें निहाल कर देती हैं।
एक महत्वपूर्ण बात बताऊं ?
इंद्रिय, इच्छा, तृष्णा और अपेक्षा यह चारों "स्त्रीलिंग" है।
इनके अधीन बने अच्छे-अच्छे शूरवीरों की इन्होंने हालत खराब कर दी है।
और इन पर जिन्होंने भी नियंत्रण लगा दिया है उन सभी को इन्होंने प्रसन्नता के गगन में विचरण करा दिया है।
हालांकि, हमारे पास एक भी शस्त्र ना हो और दुश्मन के पास एके-47 हो तो भी उस पर विजय प्राप्त करना एक बार सरल है,
पर
साधना की अद्भुत पूंजी जिसे प्राप्त हो ऐसे साधक को भी नि:शस्त्र इंद्रियों पर विजय पाना मुश्किल है।
कारण ?
सुख के जो भी अनुभव इस जीवन जीव को हुए हैं वे तमाम अनुभव इंद्रियों के माध्यम से ही हुए हैं, और जीव को सुख का आकर्षण प्रबलतम है। जहां भी सुख की संभावना दिखती है वहां प्रकृत होने के लिए इंद्रियां मानो तैयार ही बैठी होती हैं। इस स्थिति में प्रबल सत्य एवं मजबूत संकल्प के बिना इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना संभव ही नहीं है। किसी हिंदी शायर ने इस इन पंक्तियों में बहुत सुंदर बात लिखी है -
  " पिंजरा तो खुल गया, पर अपने पंख ना खुले तो क्या होगा ?
दिया तो जल गया, पर अपनी आंखे ना खुली तो क्या होगा ?
धर्मशास्त्र या उपद्देश तो अनेक सुन लिए पर अपनी गठानें न खुली तो क्या होगा ?"
मन की गठान कौन सी है ?
  यही की,
" इंद्रियां मेरे मित्र हैं क्योंकि समस्त प्रकार के सुखों का अनुभव मुझे वे ही कराती है ।" भ्रम कि यह गठान खुलते ही सच्चे अर्थों में इंद्रियां हमारे मित्र बन जाएंगी।


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