हवा बंद होने पर आकाश से धरती पर आ गिरने वाले कागज की नम्रता गौरवप्रद नहीं बनती,
पर
फलों की वृद्धि होने से झुक जाने वाली वृक्ष की डाली गौरवप्रद बन जाती है। सिर पर अत्यधिक बोझ होने के कारण झुक - झुककर चलने वाले मजदूर की नम्रता को कोई " नम्रता " नहीं कहता,
परंतु
बेतहाशा संपत्ति होने के बावजूद छोटे लोगों को स्मित देने वाली श्रीमंत की नम्रता को "नम्रता" कहते हुए सब गद् गद् हो जाते हैं। याद रखना,
" कृतज्ञता " यदि जीवन रूपी शरीर की चमड़ी है, " उदारता " यदि जीवन रूपी शरीर के वस्त्र है तो " नम्रता " जीवन रूपी शरीर का श्रेष्ठ आभूषण है ।
चमड़ी जन्म के समय ही मिल जाती है। वस्त्र भी जन्म के कुछ ही पलों में मिल जाते हैं, परंतु आभूषण पाने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
नम्रता यदि आभूषण है तो उसे प्राप्त करने के लिए जो कीमत चुकानी पड़ती है उसका नाम है अहंकार।
तुमने मिठाई में " नमक " की उपस्थिति का अनुभव कभी नहीं किया होगा,
शक्कर में " नीम " के प्रवेश की बात कभी नहीं सुनी होगी,
चंदन में " दुर्गंध " की मौजूदगी की अनुभूति कभी नहीं की होगी,
परंतु अहंकार यह एक ऐसा खतरनाक तत्व है कि जो चाहे जैसे अच्छे स्थान में, चाहे जैसे अच्छे प्रसंगों में, चाहे जैसे अच्छे व्यक्ति के समक्ष प्रगट हो जाता है और स्थान, प्रसंग तथा व्यक्ति की गरिमा को दूषित कर देता है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि
सौ करोड़ की कीमत चुकाकर कोहीनूर हीरा खरीदना सरल है, परंतु अहंकार की कीमत चुकाकर नम्रता का आभूषण खरीदना, मोम के दांत से लोहे के चने चबाने जैसा कठिन कार्य है।
शोभित देसाई की यह पंक्तियां एक अच्छा संदेश देती हैं -
" युद्ध के वक्त इतना है घुड़सवार कर,
प्रथम अपने अहंकार का संहार कर ;
जीतने संपूर्ण मानव जाति को,
पहले शास्त्रों की मोथरी धार कर "
युद्ध का मूल अहंकार है।
शास्त्रों की धार अहंकार है।
इसे नेस्तनाबूद करना ही चाहिए।
प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...
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