आप भूखे को भोजन दिखाते हो तो इससे वह खुश नहीं हो जाता। उसे खुश करने के लिए आपको उसे भोजन देना पड़ता है। दु:खी को मात्र आश्वासन के दो शब्द बोल कर प्रसन्न नहीं किया जा सकता। उसे प्रसन्न करने के लिए आपको सक्रिय बलिदान देना पड़ता है।
संक्षिप्त में,
दुनिया को आप यदि खुश करना चाहते हो तो उसका एक ही विकल्प है - सेवा ।
और सेवा का एक ही अर्थ है - सक्रिय बलिदान।
यद्यपि,
जगत को खुश करने के लिए सेवा करना यह अलग बात है और सेवा से जगत खुश होता है यह अलग बात है।
घास उगाने के लिए किसान बोवनी करें यह अलग बात है और बोवनी करने से घास उग जाए यह अलग बात है।
यहां हम जो बात कर रहे हैं वह दुनिया को खुश करने के लिए सेवा करने की नहीं, पर सेवा करने से दुनिया खुश होती है इस बारे में हैं। प्रश्न यह है कि ऐसा कौन सा तत्व है जो मन को सेवा करने के लिए उत्साहित करता रहता है ?
उत्तर है - प्रेम।
जैसे ढलान पानी को नीचे उतरने के लिए मजबूर करता ही है, वैसे प्रेम मन को सेवा करने के लिए उत्साहित करता ही रहता है। और मजे की बात तो यह है कि प्रेम मन को खुश रखता है और प्रेम के कारण होने वाली सेवा जगत को खुश रखती है।
जवाब दो -
चाबी जिस तेजी से दरवाजा खोल देती है उससे अधिक तेजी से प्रसन्नता के दरवाजा खोलने वाले प्रेम के हम मालिक हैं भला ? जगत के अज्ञानी वर्ग द्वारा ताकतहीन माने जाने वाले, पर वास्तव में सबसे अधिक ताकत के धारक प्रेम के हम स्वामी हैं भला ? यदि हां,
तो समझ लेना कि बिना संपत्ति के भी हमारा मन हमेशा खुशी रहेगा और यदि ना, तो असीम संपत्ति के बीच भी हमारा मन उदास ही रहेगा।
कितनी सुंदर बात कही है -
" प्रेम सारी जिंदगी का मर्म है उसके बिना की सभी बातें तर्क है "
अंतिम बात,
सेवा द्वारा जगत को खुश रखने में हमें सफलता मिलनी संदिग्ध है, पर प्रेम द्वारा मन को खुश रखने में सफलता मिलनी असंदिग्ध है।
प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...
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