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ऐसे बनती है अच्छी या बुरी आदत aise banti hai acchi ya buri aadat






इस संसार में हम जो कुछ देखते हैं वह सब हमारे विचारों का ही मूर्त रूप है। यह समस्त सृष्टि विचारों का ही चमत्कार है। किसी भी कार्य की सफलता-असफलता, अच्छाई-बुराई और उच्चता-न्यूनता के लिए मनुष्य के अपने विचार ही उत्तरदायी होते हैं। जिस प्रकार के विचार होंगे, सृजन भी उसी प्रकार का होगा।





विचार अपने आप में एक ऐसी शक्ति है जिसकी तुलना में संसार की समस्त शक्तियों का समन्वय भी हल्का पड़ता है। विचारों का दुरुपयोग स्वयं और संसार का विनाश भी कर सकता है।





सूर्य की किरणों जब शीशे द्वारा एक ही केंद्र पर डाली जाती हैं तो अग्नि उत्पन्न हो जाती है। इसी प्रकार विचार एक केंद्र पर एकाग्र होने से बलवान बनते हैं। आशय यह है कि हमारे विचारों की ताकत हमारे मन की एकाग्रता पर निर्भर करती है। एकाग्रता के बगैर मन में बल नहीं आ सकता।





परमार्थ के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि संसार के व्यावहारिक कार्यों में भी एकाग्रता की बड़ी आवश्यकता पड़ती है। जो मनुष्य जैसा विचार करता है, वैसा ही कार्य करता है। फिर वैसी ही उसकी आदत बन जाती है और अंत में वैसा ही उसका स्वभाव बन जाता है।





ऐसा ही गीता में भी कहा गया है कि जो जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। यदि आप उत्तम जीवन जीना चाहते हैं तो आपको वैसे ही विचार करने का अभ्यास करना चाहिए। विचारों के सदुपयोग से मनुष्य विश्व विजयी हो सकता है।





हजारों आविष्कार उन्हीं अच्छे विचारों के परिणाम हैं। विचार करते समय सकारात्मक बातों, दृश्यों, वस्तुओं और पदार्थो के बारे में ही चिंतन करना चाहिए कि हमारे मन में आनंदपूर्ण विचारों का ही प्रवाह बहेगा और उदासीनता के विचार मेरे पास फटकने तक न पाएंगे।





बेईमानी, धोखेबाजी और खुदगर्जी के विचार लौकिक और पारलौकिक दोनों ही दृष्टि से बहुत ही घातक हैं। इस प्रकार के विचारों वाले व्यक्ति को पग-पग पर घृणा, उपहास, बदनामी और अविश्वास का सामना करना पड़ता है। विचारों का सदुपयोग करने के लिए विचारों को योजनाबद्ध बनाना चाहिए। एकाग्रता का तात्पर्य है कि अस्त-व्यस्त ढंग से सोचने की बुरी आदत को क्रमबद्ध और सुसंस्कृत बनाया जाए।


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