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दृष्टिकोण बदलना जरूरी है drishtikon badalna jaruri hai


एक घटना, ससुराल से एक बहिन पीहर जा रही थी । प्रातःकाल का समय था । रियाँ-पीपाड़ की बात कहो या विजयनगर-गुलाबपुरा की । बीच में मात्र एक नदी पड़ती है । वह ग्राम के किनारे पर पहुँची ही थी कि अचानक हार्ट अटैक हुआ, धड़कन तेज हुई और एक झटका लगने के साथ वह पेड़ के सहारे बैठ गई, और चल बसी ।





शव पडा़ हुआ है, वह लाश है, नारी का कलेवर है । एक वासना का प्रेमी उधर से निकला, नजर पड़ी । पत़्नी तो मेरे भी है, वह काली कलुटी है, रात-दिन झगडा़ होता रहता है । मुझे ऐसी पत़्नी मिले तो मैं सुखी हो जाऊँ । वह मिलने वाली नहीं, वह तो कलेवर है, पर उसकी दृष्टि वासना वाली है, इसलिए वह उस लाश को देखकर क्या चिंतन कर रहा है ? विकार का, वासना का ।





उधर रात भर से घूमता-घामता एक चोर निकला । उसकी नज़र लाश के गहने पर है । चोर वहीं खडा़ हो गया । वह सोच रहा है कि यह आदमी यहाँ से निकल जाय तो मेरा काम मिनटों में हो जायेगा । मैं इसके सारे गहने लेकर धनवान बन जाऊँगा । दोनों व्यक्ति अपनी-अपनी दृष्टि से सोच रहे हैं।





इतने में एक सियार आ गया । वह भूखा एवं माँस का लोभी था । जीभ लपलपाने लगा । सोचा – ये लोग यहाँ से चले जायें तो मूझे ताजा माँस खाने को मिल जायेगा।





वस्तु एक है, देखने वाले तीन हैं । एक रुप पर आसक्त है, एक धन पर और एक माँस पर । सूर्योदय हो चुका था । एक संत विहार करके उधर से निकल रहे थे । तपस्या का पारणा था । अचानक नज़र पड़ी, अरे, इस युवावस्था में मानव जन्म, आर्य क्षेत्र, उत्तम कुल, नीरोगी काया, पाँचों इन्द्रियाँ सब जोगवाही पाकर भी यह जीव आया और चला गया । इस आयुष्य का क्या ठिकाना ? यह हंस न जाने कब उड़ जाय । महाराज के पचोले का पारणा करना था, पारणा करने के बजाय नश़्वरता का चिन्तन चल पडा़ एवं पारणे का विचार त्याग दिया ।





उन चारों ने कलेवर देखा । न तो उपदेश सुना और न हीं गुरु का सानिध्य । प्रेरणा करने वाला कोई नहीं था, बस दृष्टि प्रेरणा कर रही थी । शव देखकर तीन व्यक्ति कर्म का बंधन कर रहे थे और उसी को देखकर संत काया का सार निकालने हेतु तप की प्रेरणा ले रहे थे ।





एक ही वस्तु के प्रति व्यक्तियों के अध्यवसायों का अंतर हो सकता है । इसीलिए कहा जा रहा है – “जे आसवा ते परिस्सवा, जे परिस्सवा ते आसवा ।” जो निमित्त बंध के कारण हैं उनसे निर्जरा भी हो सकती है।






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