Skip to main content

ऊपर वाले की अदालत में वकालत नहीं होती। Upar wale ki adalat mein vakalat Nahin Hoti.






एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें , प्रार्थना करें । बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते।





जब संत घर आए तो पिता पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे।
एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी।
संत ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से ये कुर्सी यहां पहले से ही रख दी गई।
संत … - मुझे लगता है कि आप मेरे ही आने की उम्मीद कर रहे थे।
पिता... - नहीं , आप कौन हैं ?
संत ने अपना परिचय दिया...
और फिर कहा - मुझे ये खाली कुर्सी देखकर लगा कि आप को मेरे आने का आभास था।
पिता...
ओह ये बात...
खाली कुर्सी...
आप...
आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाज़ा बंद करेंगे।
संत को ये सुनकर थोड़ी हैरत हुई , फिर भी दरवाज़ा बंद कर दिया।
पिता...
दरअसल इस खाली कुर्सी का राज़ मैंने किसी को नहीं बताया...
अपनी बेटी को भी नहीं...
पूरी ज़िंदगी , मैं ये जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है।मंदिर जाता था , पुजारी के श्लोक सुनाता , वो सिर के ऊपर से गुज़र जाते कुछ पल्ले नहीं पड़ता था।
मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया। लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला। उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है। उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो। फिर विश्वास करो कि वहां भगवान खुद ही विराजमान हैं।
अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो , जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो।
मैंने ऐसा करके देखा...
मुझे बहुत अच्छा लगा...
फिर तो मैं रोज़ दो - दो घंटे ऐसा करके देखने लगा...
लेकिन ये ध्यान रखता कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले...
अगर वो देख लेती तो उसका ही नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता या वो फिर मुझे साइकाइट्रिस्ट के पास ले जाती...
ये सब सुनकर संत ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की...
सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा...
संत को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था...
इसलिए विदा लेकर चले गए..….
दो दिन बाद बेटी का संत को फोन आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद मृत्यु हो गई थी ,
जिस दिन वो आप से मिले थे...
संत ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई...
बेटी ने जवाब दिया...नहीं ,
मैं जब घर से काम पर जा रही थी तो उन्होंने मुझे बुलाया...
मेरा माथा प्यार से चूमा...
ये सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी , जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी...
जब मैं वापस आई तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे...
लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज़ भी देखी...
वो ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाया हो...
संत जी , वो क्या था...
ये सुनकर संत की आंखों से आंसू बह निकले...
बड़ी मुश्किल से बोल पाए...
काश , मैं भी जब दुनिया से जाऊं तो ऐसे ही जाऊं...





किन साँसों का मैं एतबार करूँ जो अंत में मेरा साथ छोड जाऐंगी....…





किस धन का मैं अंहकार करूँ जो अंत में मेरे प्राणों को बचा ही नहीं पाएगा..….





किस तन पे मैं अंहकार करूँ जो अंत में मेरी आत्मा का बोझ भी नहीं उठा पाएगा....…





ऊपरवाले की अदालत में वकालत नहीं होती..…
....और यदि सजा हो जाये तो जमानत नहीं होती.....


Comments

Popular posts from this blog

निंदा - Ninda

निंदा पत्नी ने पति से कहाँ- टीवी कि आवाज जरा कम कर दो इस आवाज की वजह से पडोस मैं जो पति- पत्नी झगड रहे है वह मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। सबक दुसरो कि निंदा सुनने में बडा आंनद आता है इस लिए गुरु के हितकारी प्रवचन हम सुन नहीं सकते हैं। निंदा करना और सुनना प्रवचन सुनने के लिए बाधक भी है और उसके प्रभाव को नाश करने वाला है।

लक्ष्मण को दिया था रावण ने अंतिम संदेश Lakshman ko diya tha ravan ne antim Sandesh

रावण जब मृत्यु शैया पर थे तब राम ने लक्ष्मण से कहा कि, "तुम रावण के पास शीघ्र पहुंचों। उसके पास अमूल्य ज्ञान है, उसे अर्जित करो। उससे जगत के लिए अंतिम संदेश ले आओ।" लक्ष्मण दौड़े। उसने रावण से कहा, "राम रो रहे हैं।" रावण के द्वारा वजह पूछने पर लक्ष्मण ने बताया कि "आपके अंतकाल से व्यथित हुए हैं। मुझे आपके पास अंतिम संदेश प्राप्त करने के लिए भेजा है। बड़े भैया ने कहलवाया है कि "आप अनेक गुणों के भंडार हैं। सीता का अपहरण तो आपकी आकस्मिक (कर्मोदय जनित) भूल थी।" आंख में अश्रु सहित रावण ने कहा कि "मेरे जैसे शत्रु का भी राम गुणकथन करते हैं। इसी लिए राम जगत में भगवान के रूप में पूजे जाते हैं।" अब आपको मेरा अंतिम संदेश यह है, कि" आज की बात कल पर छोड़नी नहीं चाहिए। मेरी इच्छा थी कि मैं स्वर्गगमन के लिए धरती पर सीढी रखूं, जिससे सभी जीव स्वर्गारोहण कर सकें, कोई भी नरक की दिशा में गति न करें, पर वह कार्य अधूरा ही रह गया। मैंने इस काम में विलंब किया और मौत वेग से आगे बढ़ गई। अब अफसोस करने में क्या लाभ। Rich Dad Poor Dad - 20th Anniversa...

मन में उत्पन्न भावों का प्रभाव अत्यंत बलशाली होता है। Maan main utpann bhavo ka prabhav atyant balshali hota hai.

एक हाथी प्रतिदिन पानी पीने के लिए बाजार में से होकर नदी के किनारे पर जाया करता था। मार्ग में दर्जी की दुकान आती थी। दर्जी पशु - प्रेमी था। हाथी जब भी उधर से गुजरता तो उसे खाने के लिए कुछ ना कुछ जरूर देता। हाथी भी खुश हो जाता। वह भी जब पानी पीकर वापस आता तो उद्यान में से पुष्पों को तोड़कर दर्जी की दुकान पर डाल जाता। प्रतिदिन का यह कार्यक्रम बन गया। एक दिन दर्जी किसी कार्य अवश्य बाहर गया हुआ था। दुकान पर उसका बेटा बैठा हुआ था। हाथी प्रतिदिन के कार्यक्रम के अनुसार दर्जी की दुकान पर जाकर अपनी सूंड को लंबा किया। दर्जी पुत्र को पिता के कार्य की जानकारी ना होने से अपनी भावना के अनुसार हाथी की सूंड पर जोर से सुई लगा दी। हाथी चुपचाप वहां से चला गया। हाथी पंचेइंद्रियों प्राणी है। उसके पास मन है। दर्जी पुत्र के दुर्व्यवहार से उसका मन ग्लानि से भर गया। नदी के किनारे पानी को पीया। प्रतिदिन तो उद्यान में जाकर फूलों को तोड़ता था, आज उसने बगीचे में ना जाकर गंदे नाले के पास गया, वहां सूंड में कीचड़ भर लिया। जैसे ही दर्जी की दुकान के पास पहुंचा और कीचड़ से भरी सूंड को उसकी दुकान पर उछाला। दर्जी पुत्र भी...