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कवि की बेटी एक बार कवि धनपाल राजा भोज को अपना कथा ग्रंथ सुना रहे थे। जब धनपाल पूरी कथा सुना चुके तो राजा भोज बोले, 'कथा में विनता का जो वर्णन आया है-उसे हटाकर अवन्ति तथा शुक्रावतार तीर्थ को बदलकर महाकाल नाम दे दें तो यह कथा हमारे राज्य और सीधे हमसे जुड़ सकती है। इसके बदले आप जो भी पुरस्कार चाहें, हम देंगे।' राजा भोज की बात सुनकर कवि धनपाल बोले, 'महाराज ! धन के लिए ग्रंथ में परिवर्तन करना मेरे लिए संभव नहीं है। यह मेरी आत्मा को कभी भी स्वीकार्य नहीं होगा। मैं मन से लिखता हूं। लिखते समय मेरे मन में पैसे की लालसा जरा भी नहीं रहती।' कवि धनपाल का यह जवाब राजा भोज को चुभ गया। उन्होंने इसमें अपना अपमान महसूस किया और देखते-देखते क्रोध में धनपाल का वह नवीन ग्रंथ उन्होंने आग में डाल दिया। कुछ ही देर में वह ग्रंथ जलकर राख बन गया। इसके बाद धनपाल दुखी मन से घर लौटे और उदास होकर एक ही स्थान पर बैठे रहे। धनपाल की बेटी तिलक मंजरी से पिता की उदासी छिप नहीं पाई। उसने अपने पिता को इतना हताश और उदास कभी नहीं देखा था। उसने पूछा, 'क्या हो गया ? ग्रंथ कहां है?' धनपाल ने दुखी मन से पूरी घटना तिलक मंजरी को सुना दी। पूरी बात सुनने के बाद तिलक मंजरी बोली, 'पिताजी, उदास मत होइए, न ही चिंता करिए। मैंने पूरा ग्रंथ पढ़ा था, मुझे ग्रंथ की कथा स्मरण है। मैं उसे दोहराती जाऊंगी और आप उसे लिखते जाइएगा।' बेटी की बात सुनकर धनपाल का चेहरा चमक गया। उन्होंने बेटी के सहयोग से अपना ग्रंथ नए सिरे से लिखना शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में वह पूरा हो गया। इस ग्रंथ का नाम उन्होंने अपनी बेटी के नाम पर 'तिलक मंजरी' रखा। यह ग्रंथ आज भी कवि धनपाल की महत्वपू्र्ण रचनाओं में से एक है। --Archana App


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जिनके साथ हम रहेंगे वैसे ही बन जाएंगे। Jinke sath ham rahenge vaise hi ban jaenge

प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...

बड़प्पन उम्र से नहीं अच्छे कर्मों से सिद्ध होता है badappan umra se nahin acche karmon se siddh hota hai

बड़ा तो गधा भी हो जाता है और कुत्ता भी हो जाता है, गुंडा भी हो जाता है और दुर्जन भी हो जाता है, चोर भी हो जाता है और व्यभिचारी भी हो जाता है। मात्र समय व्यतीत होता है और यह सभी बड़े हो जाते हैं। परंतु, यह " बड़प्पन " न तो गौरवप्रद बनता है और न ही किसी के लिए आलंबन रूप बनता है। परंतु…… एक बड़प्पन ऐसा है कि जिसका संबंध समय के साथ नहीं, पर सत्कार्यों के साथ है। उम्र के साथ नहीं, पर विवेक के साथ है। यह बड़प्पन गौरवप्रद भी बनता है और अनेकों के लिए आलंबन रूप भी बनता है। एक सनातन सत्य हमें आंखों के सामने रखना है और वह यह है कि   जिंदगी की लंबाई बढ़ाने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते लेकिन हमारे हाथ में यह दो चीजें हैं - जिंदगी की चौड़ाई हम बढ़ा सकते हैं, जिंदगी की गहराई हम बढ़ा सकते हैं। जीवन को यदि हम सत्कार्यों से महका रहे हैं तो हमारे जीवन की चौड़ाई बढ़ रही है और उन सत्कार्यों के फल - स्वरुप यदि हमारे मन की प्रसन्नता बनी रहती है तो हमारे जीवन की गहराई बढ़ रही है। पर कैसी दयनीय दशा है हमारी ? जीवन की इस जिस लंबाई को बढ़ाने में स्वयं परमात्मा को भी सफलता नहीं मिली उस लंबाई को बढ़ाने ...

कल की चिंता में वर्तमान समय को व्यर्थ ना गवाएं cal ki chinta mein vartman samay ko vyarth Na gavan

" रात गई बात गई " जो इस भाव में जीता है उसके पास भला तनाव कहां से आएगा ? रात की बात को सुबह लाना और सुबह की बात को रात तक खींच कर ले जाना ही तो चिंता का बसेरा बसाना है । अगर आप जी सकें तो वर्तमान में जीने की कोशिश कीजिए। जो जैसा मिला है उसे जिया जाए‌। जैसे आप अपने घर में खूंटियों पर कपड़े लटकाते हैं वैसे ही उन खूंटियों पर अतीत की यादें लटका दें, भविष्य की कल्पनाओं को लटका दें और आप वर्तमान में जिएं। जो वर्तमान में जीता है जैसी व्यवस्था मिलती है उसे स्वीकार कर लेता है, वह चिंतामुक्त है। कोठरी का भी स्वागत करो और कोठी का भी स्वागत करो। वर्तमान में जीते हुए प्रकृति के सानिध्य में रहने की कोशिश करें। प्रकृति जो कर देती है वही ठीक है। चिंता करने से जीवन के संयोग नहीं बदलते। चिंताओं से समस्या का समाधान भी नहीं निकला करता। अच्छा होगा चिंता करने के बजाय चिंतन करें, निर्णय लें तदनुसार कार्य करें, परिणाम जो आए उसका स्वागत करें। एक अन्य काम और करें कि जीवन में घटी दुर्घटनाओं को अधिक तवज्जो ना दें। उठा-पटक हर किसी की जिंदगी में होती है तभी तो आदमी को "समझ" आती है। लेकिन जो ब...