सड़क किनारे एक बुढ़िया अपना ढाबा चलाती थी। एक मुसाफिर आया। दिन भर का थका , उसने विश्राम करने की सोची। बुढिया से कहा , ' क्या रात्रि भर यहां आश्रय मिल सकेगा ? '
बुढ़िया ने कहा , क्यों नहीं , आराम से यहां रात भर सो सकते हो। ' यात्री ने पास में पड़ी चारपाइयों की ओर संकेत कर कहा , ' इस पर सोने का क्या चार्ज लगेगा? '
बुढ़िया ने कहा , ' चारपाई के सिर्फ आठ आना।' यात्री ने सोचा रात भर की ही तो बात है। बेकार में अठन्नी क्यों खर्च की जाए। आंगन में काफी जगह है , वहीं सो जाऊंगा।
यह सोचकर उसने फिर कहा , ' और अगर चारपाई पर न सोकर आंगन की भूमि पर ही रात काट लूं तो क्या लगेगा? '
' फिर पूरा एक रूपया लगेगा। ' बुढ़िया ने कहा। बुढ़िया की बात सुन यात्री को उसके दिमाग पर संदेह हुआ। चारपाई पर सोने का आठ आना और भूमि पर चादर बिछाकर सोने का एक रूपया। यह तो बड़ी विचित्र बात है। उसने बुढिया से पूछा , ' ऎसा क्यों ? '
बुढ़िया ने कहा , ' चारपाई की सीमा है। तीन फुट चौड़ी , छह फुट लंबी जगह ही घेरोगे। बिना चारपाई सोओगे तो पता नहीं कितनी जगह घेर लो। ' सीमा में रहना ही ठीक है। असीम की बात समस्या पैदा करती है।
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