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विट्ठल तो मुझे हमेशा से देख रहा है। Vitthal Tu mujhe hamesha se dekh raha hai.


नेत्रहीन विट्ठल भक्त कात्यान सुदूर पहाड़ी पर स्थित मंदिर में आयोजित एक मेले में अन्य ढेरों श्रद्धालुओं के साथ जा रहा था।





वह पूरे उत्साह के साथ विट्ठल के भजन गा रहा था। भीड़ में हट्टे - कट्टे नौजवान भी थे और कई वयस्क स्त्री - पुरुष भी , जो हांफते हुए रास्ता पार कर रहे थे। कात्यान को देखकर एक युवक ने पूछा - पहाड़ी तो बहुत ऊंची है और अभी चौथाई रास्ता भी पार नहीं हो पाया है। तुम वहां तक कैसे पहुंच पाओगे ?





कात्यान हंसते हुए बोला - मित्र , मैं तो केवल अपना शरीर ढो रहा हूं। मेरी आत्मा तो कब की ऊपर विट्ठल के पास जा चुकी है। इस जवाब ने युवक में जोश भर दिया और वह भी जयकारा लगाता हुआ ऊपर चढ़ने लगा।





वह अपने सारे कष्ट भूल गया। हालांकि सबसे अधिक कष्ट कात्यान को ही हो रहा था। फिर भी वह अपनी गठरी और झोला संभाले चला जा रहा था। जब सब ऊपर मंदिर के पास पहुंच तो एक भक्त ने कात्यान से पूछा - आप इतने कष्ट उठाकर यहां तक क्यों आए ? आपकी तो आंखें ही नहीं हैं। भला आप क्या दर्शन करेंगे ?





इस पर कात्यान ने थोड़ा भावुक होकर कहा - भाई मैं विट्ठल को न देख पाऊं तो क्या हुआ। मेरा विट्ठल तो मुझे पहाड़ी के नीचे से ही देख रहा है। जो सबको देखता है , उसे मैं देखूं या न देखूं , क्या फर्क पड़ता है।


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