मन की यह मान्यता है कि तृप्ति के लिए प्राप्ति अनिवार्य है , प्राप्ति के लिए प्रवृत्ति अनिवार्य है और प्रवृत्ति के लिए इच्छा अनिवार्य है ।
संक्षिप्त में ,
इच्छा के बिना प्रवृत्ति नहीं है , प्रवृत्ति के बिना प्राप्ति नहीं है और प्राप्ति के बिना तृप्ति नहीं है।
पर , वास्तविक परेशानी यह है की
प्राप्ति के लिए चाहिए वह पुण्य मर्यादित है , प्रवृत्ति के लिए चाहिए वह शक्ति मर्यादित है, पर इच्छाएं ?
वे तो आकाश के समान अनंत है ।
एक - दो - पांच या पंद्रह इच्छाओं को तुम शायद प्रवृत्ति में रूपांतरित कर सकते हो , पर जहां इच्छाएं अनंत हो वहां तुम क्या कर सकते हो ?
और इन इच्छाओं का स्वरूप भी कैसा ?
तुम बिल्कुल न समझ सको ऐसा !
सुबह मिठाई की मांग करने वाला मन शाम को कड़वी नीम की मांग करने लगता है ! सुबह किसी का खून करने के लिए तैयार हो जाने वाला मन शाम को उसी की खातिर जान देने के लिए तैयार हो जाता है !
सुबह भगवान के पीछे पागल मन शाम को स्त्री के विचारों में रमने लगता है ।
ऐसे सर्वथा न समझे जा सकने वाले मन को तुम खुश रखने में या खुश करने में सफल बन सकते हो?
सर्वथा असंभव !
इच्छा ! यह मन का ही शायद दूसरा नाम है। तुमने खो-खो का खेल शायद देखा होगा ।उस खेल में भाग लेने वाले के लिए दौड़ना खुद के वश में नहीं होता , दूसरा उसके आगे खड़ा हो जाए तो उसे दौड़ना ही पड़ता है। बस , मन का ही है।
आत्मा को शांति से बैठने ही नहीं देता।
जहां मन आकर खड़ा हो जाता है आत्मा को भागना ही पड़ता है।
अपने भूतकाल पर दृष्टिपात करके देखो , तुम्हें स्पष्ट ख्याल आ जाएगा की इच्छाओं ने तुम्हारा सुख - चैन ,शांति और प्रसन्नता , सब कुछ छीन लिया है ।
मनुष्य सागर के पानी को समझ सका है ।वह चाहे कितना भी पी लिया जाए , उससे तृषा नहीं मिटती इसका उसे ख्याल है और इसीलिए जब उसे प्यास लगती है तब वह तालाब के पानी की ओर ही दृष्टि डालता है , सागर के पानी के बारे में सोचता तक नहीं। इतना ही कहूंगा कि
इच्छाओं का स्वरूप सागर के पानी जैसा है , तृप्ति के लिए उसकी और ध्यान केंद्रित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...
बहुत सुंदर अभिव्यक्त किया है 🙏🏻😊
ReplyDeleteधन्यवाद
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