गरीबी से तंग आकर एक व्यक्ति जंगल की ओर चला गया। जंगल में उसने एक संन्यासी को देखा।
संन्यासी के पास जाकर वह बोला , 'महाराज मैं आपकी शरण में आया हूं। गरीब आदमी हूं , मेरा उद्धार करो। '
साधु ने कहा , ' क्या चाहिए तुम्हें। '
वह बोला , ' मेरी स्थिति देखकर पूछ रहे हैं कि क्या चाहिए मुझे। मैं गरीब हूं। धन दे दें। '
संन्यासी ने कहा , ' धन छोड़कर ही तो मैं जंगल में आया हूं। धन तो मेरे पास नहीं है। ' गरीब याचक अड़ गया। उसकी भावना देखकर संन्यासी द्रवित हो गए और बोले , ' मेरे पास तो कुछ है नहीं , दूर सामने जो नदी के पास चमकीला पत्थर है , उसे ले लो।
याचक बोला , ' पत्थर तोड़-तोड़ कर ही तो मेरे हाथ में छाले पड़े हैं। कुछ धन दिलाएं जिससे गरीबी दूर हो। '
संन्यासी ने कहा , वह सामान्य पत्थर नहीं , पारस पत्थर है। वह प्रसन्न हो गया और पारस पत्थर उठाकर घर की ओर चल पड़ा।
पत्थर लेकर वह चल तो पड़ा , लेकिन रास्ते में मन में उथल-पुथल होने लगी। पहले तो सोचा कि चलो अच्छा हुआ , गरीबी मिट गई , पर तत्काल दूसरा चिन्तन शुरू हो गया। चिंतन गंभीर होता गया।
वह वापस संन्यासी के पास जा पहुंचा और बोला , ' यह वापस करने आया हूं। '
संन्यासी ने कहा , ' क्यों ? '
याचक बोला , ' आपने मुझे पारस पत्थर दिया। इसका अर्थ यह है कि आपके पास इससे भी और कोई मूल्यवान चीज है। वह मुझे दे दीजिए जिसे पाकर आपने इसे त्याग दिया। '
जिस व्यक्ति में तृष्णा का नाश हो जाता है , उसके लिए कोई भी वस्तु , कितनी भी कीमती क्यों न हो , कोई मायने नहीं रखती।
आकर्षण तृष्णा के कारण ही पैदा होता है।
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