Skip to main content

पृथ्वी पर सर्वप्रथम श्राद्ध प्रथा इन्होंने ही शुरू की prithvi per sarvpratham shraddh pratha unhone hi shuru ki


हिन्दू धर्म में हर संतान के लिए यह परम कर्तव्य माना गया है की वह अपने पिता या पूर्वजो  को तृप्त करने के लिए श्राद्ध अवश्य करे।





श्राद्ध के समय पितृलोक  से पूर्वज भोजन की आशा में पृथ्वी लोक अपने पुत्र वंशजो के पास आते है तथा श्राद्ध के रूप में हम जो प्रसाद ब्राह्मण , गाय , कौआ आदि को देते है वही प्रसाद सूक्ष्म रूप में हमारे पूर्वजो के पास पहुचता है जिसे प्राप्त कर वे अपनी भूख मिटाते है व वापस पितृलोक को प्रस्थान करते है।





इसी संबंध में धर्मिक ग्रंथो  से एक कथा मिलती जिसमे महावीर कर्ण पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपनेपितरो को तृप्त करने के लिए श्राद्ध का आरम्भ किया था। महावीर कर्ण कुंती के पुत्र थे तथा पांडवो में सबसे बड़े थे।





अपनी दानशीलता के कारण वे प्रसिद्ध थे उनके द्वार पर आया जरूरतमंद और गरीब व्यक्ति कभी खाली हाथ नही गया यहा तक की भगवान श्री कृष्ण ने भी उनकी दानशीलता की अनेको बार परीक्षा ली। महावीर कर्ण महाभारत के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए तथा उन्हें स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त हुआ। जब वे स्वर्गलोक पहुंचे तो उनके भोजन का समय हुआ , स्वर्गलोक के  सेवक कुछ बड़े से  थाल लेकर कर्ण के समीप पहुंचे। जब कर्ण ने उन थालो में भोजन की जगह बहुत सारी स्वर्ण मुद्राए , मोती हीरे देखे तो वे आश्चर्य चकित रह गए तथा भूख से व्याकुल होकर वे देवराज इंद्र के समीप पहुंचे।





इंद्र ने उनसे उनकी व्याकुलता का कारण पूछा तो कर्ण बोले की यहा अन्य व्यक्तियों को तो समान्य भोजन परोसा जा रहा है परन्तु मुझे भोजन के रूप में स्वर्ण , हीरे तथा अन्य आभूषण क्यों परोसे जा रहे है ?





तब देवराज इंद्र कर्ण से बोले की आपकी दानवीरता के कारण पृथ्वी में हर जगह आपकी ख्याति है तथा आपने हर जरूरतमंद व्यक्ति को आपने अपने द्वार से कभी खाली हाथ नही भेजा परन्तु आपने कभी भी अपनेपूर्वजो  के नाम से भोजन का दान नही किया। जो भी गरीब व्यक्ति आपके द्वार पर आया आपने उसे सिर्फ कीमती आभूषणो का ही दान किया जिस कारण आपको भोजन के रूप में वही आभूषण परोसे जा रहे है।





यदि आपने अपने पितरो के नाम पर भोजन दान कर उन्हें संतुष्ट और तृप्त किया होता तो आपको भी अन्य व्यक्तियों के भाति ही समान्य भोजन परोसा जाता। दानवीर कर्ण ने जब इस समस्या के समाधान के लिए इंद्र से उपाय पूछा तो वे बोले की आप पुनः धरती पर जाये तथा अपने पितरो की श्रद्धांजलि के लिए श्राद्ध कर उन्हें पिण्डंदान और तर्पण के माध्यम से संतुष्ट करे ।





देवराज इंद्र के कहे अनुसार कर्ण पुनः धरती पर आये तथा अपने पूर्वजो का आह्वान कर उन्होंने पुरे विधि विधान से पिंडदान और तर्पण का कार्य कर अपने पितरो को संतुष्ट किया। जिस समय महावीर कर्ण अपने पितरो का श्राद्ध कर रहे थे उस समय सूर्य कन्या राशि में था तथा मान्यता है की जब सूर्य कन्या राशि में होता है तो चन्द्रमा धरती के सबसे निकट होता है।





तथा पूर्वजो का जो पितृलोक है वह ठीक चन्द्रमा के ऊपर की ओर है। जब यह स्थिति बनती है तब पितृलोक से पितृ अपने पृथ्वी वासी वंशजो के पास श्राद्ध के रूप में भोजन ग्रहण करने आते है तथा तथा धरतीलोक  पर पितरो को श्राद्ध के माध्यम से संतुष्ट किया जाता है।





इस प्रकार महवीर कर्ण ने इंद्र के आज्ञानुसार धरती पर सर्वप्रथम श्राद्ध करने की शुरुवात की थी इसके बाद धरती पर श्राद्ध की प्रथा आरम्भ हुई व धरतीवासी अपने पितरो को संतुष्ट करने के लिए श्राद्ध करने लगे !


Comments

Popular posts from this blog

निंदा - Ninda

निंदा पत्नी ने पति से कहाँ- टीवी कि आवाज जरा कम कर दो इस आवाज की वजह से पडोस मैं जो पति- पत्नी झगड रहे है वह मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। सबक दुसरो कि निंदा सुनने में बडा आंनद आता है इस लिए गुरु के हितकारी प्रवचन हम सुन नहीं सकते हैं। निंदा करना और सुनना प्रवचन सुनने के लिए बाधक भी है और उसके प्रभाव को नाश करने वाला है।

अनाथ anath

श्रमण अनाथी , नगर के बाहर उपवन में थे युवा अवस्था , भरपूर चैतन्य शक्ति और ऊर्जा का आध्यात्मिक प्रयोग वर्षों की साधना को घंटों में पूर्ण कर रहे थे। एक दिन उपवन में सम्राट श्रेणिक पहुंचे । मुनि के दमकते हुए चेहरे और उभरते हुए यौवन से श्रेणिक विस्मय -विमुग्ध हो उठे। सोचने लगे ,यह सौंदर्य भोग के लिए है या योग के लिए है ? सन्यासी होने का अर्थ यह तो नहीं है कि जीवन के साथ ही अन्याय किया जाए। श्रेणिक मुनि के पास पहुंचे । पूछा ' इस तरह यौवन अवस्था में गृह - त्याग कर सन्यास अपनाने की सार्थकता क्या है ? मुनि ! यह यौवन , भोगों को भोगने के लिए है । तुम उसे क्षीण कर रहे हो । ' मुनि ने कहा , ' नहीं ! मैं ऊर्जा का सदुपयोग कर रहा हूं । वह व्यक्ति भला साधनाओं की पराकाष्ठाओं को कैसे छू पायेगा जो अपना यौवन संसार को सौंपता है और बुढ़ापा परमात्मा को। राजन ! जितनी उर्जा भोग के लिए चाहिए , उससे सौ -गुनी ऊर्जा योग के लिए भी आवश्यक है । ' सम्राट सकपका गया । पूछने लगा ' मुनिवर ! क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं । ' मुनि ने कहा , ' अनाथी । ' ' अनाथी ! बड़ा विचित्र नाम है। मु...

लक्ष्मण को दिया था रावण ने अंतिम संदेश Lakshman ko diya tha ravan ne antim Sandesh

रावण जब मृत्यु शैया पर थे तब राम ने लक्ष्मण से कहा कि, "तुम रावण के पास शीघ्र पहुंचों। उसके पास अमूल्य ज्ञान है, उसे अर्जित करो। उससे जगत के लिए अंतिम संदेश ले आओ।" लक्ष्मण दौड़े। उसने रावण से कहा, "राम रो रहे हैं।" रावण के द्वारा वजह पूछने पर लक्ष्मण ने बताया कि "आपके अंतकाल से व्यथित हुए हैं। मुझे आपके पास अंतिम संदेश प्राप्त करने के लिए भेजा है। बड़े भैया ने कहलवाया है कि "आप अनेक गुणों के भंडार हैं। सीता का अपहरण तो आपकी आकस्मिक (कर्मोदय जनित) भूल थी।" आंख में अश्रु सहित रावण ने कहा कि "मेरे जैसे शत्रु का भी राम गुणकथन करते हैं। इसी लिए राम जगत में भगवान के रूप में पूजे जाते हैं।" अब आपको मेरा अंतिम संदेश यह है, कि" आज की बात कल पर छोड़नी नहीं चाहिए। मेरी इच्छा थी कि मैं स्वर्गगमन के लिए धरती पर सीढी रखूं, जिससे सभी जीव स्वर्गारोहण कर सकें, कोई भी नरक की दिशा में गति न करें, पर वह कार्य अधूरा ही रह गया। मैंने इस काम में विलंब किया और मौत वेग से आगे बढ़ गई। अब अफसोस करने में क्या लाभ। Rich Dad Poor Dad - 20th Anniversa...