एक बार गुरु नानक देव एक नगर में गए। वहां सारे नगरवासी इकट्ठे हो गए। वहां एक महिला भक्त गुरु नानक देव जी से कहने लगी , 'महाराज मैंने सुना है , आप सभी के दु:ख दूर करते हो। मेरे भी दु:ख दूर करो।
मैं तो रोज रोटी अपने घर से बनाकर लंगर में बांटती हूं , फिर भी मुझे सुख क्यों नहीं महसूस होता ? '
गुरु नानक देव जी ने कहा , ' तुम दूसरों का दु:ख अपने घर लाती हो , इसीलिए दु:खी हो।' महिला भक्त बोली , ' महाराज , मुझे कुछ समझ नहीं आया , मुझ अज्ञानी को ज्ञान दो। '
फिर गुरु नानक देव ने पूछा , ' तुम जो रोटी लंगर में बांटती हो , उसके बदले में वहां से क्या लेकर जाती हो ? ' स्त्री ने जवाब दिया , सिर्फ आपके लंगर के सिवा और कुछ भी नहीं । '
गुरु नानक देव जी ने कहने लगे , ' लंगर का मतलब है एक रोटी खाना और अपने गुरु का शुकर मनाना। पर तुम तो रोज बड़ी - बड़ी थैलियों में रोटी भर - भर के वापस ले जाती हो। तुम अपने घर के सभी को लंगर खिलाती हो , पर यह नहीं जानती कि गुरुद्वारे में इस लंगर को चखने से कितनों के दु:ख दूर होने थे। तुमने अपने सुख के लिए दूसरों के दु:ख दूर नहीं होने दिए। तुम लंगर से उनके सारे दु:ख अपने घर ले जाती हो और दु:खी रहती हो। '
यह सुनते ही उस महिला भक्त की आंखों से पर्दा हट गया। रोते हुए बोली , ' महाराज , में अंधकार में डूबी थी। मुझे क्षमा करो। '
गुरु नानक देव जी ने समझाया कि इंसान अपने दु:ख खुद खरीदता है , पर उसे कभी पता नहीं चलता। इसीलिए लंगर में अपनी भूख जितना ही खाना चाहिए और लंगर के प्रसाद को भर - भर कर घर कभी नहीं लाना चाहिए । प्रसाद का हर कण कृपा होती है , जिस पर सबका हक है।
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