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आत्मा ही मेरी पूंजी है और परमात्मा ही मेरा अंतर - सुख है atma hi meri punji hai aur parmatma hi Mera Antar sukh hai


नगरवासी सो कर उठे थे। कि उन्हें एक अद्भुत घोषणा सुनाई दी , ' संसार के लोगों ! दुनिया में सुखों की अनमोल भेंट दी जा रही है।





जो व्यक्ति इस अचूक अवसर का लाभ उठाना चाहे वह आज अर्ध - रात्रि में अपने दु:खों को कल्पना की गठरी में बांधकर गांव के बाहर नदी में फेंक आए और लौटते समय जिन सुखों की कामना करता हो , उन्हें उसी गठरी में बांधकर सूर्योदय से पूर्व घर लौट आए। एक रात्रि के लिए पृथ्वी पर यह कल्प - वृक्ष का अवतरण है। '





जैसे-जैसे रात करीब आने लगी , नास्तिक भी आस्तिक होने लगे। कोई भी व्यक्ति इस अवसर को खोना नहीं चाहता था। सभी अपने दु:खों की गठरियां बांधने लगे। सभी चिंतित थे यह सोचकर कि कहीं कोई दु:ख बांधने से छूट न जाए।





आधी रात होते-होते नगर के सभी घर खाली हो गए। असंख्य के लोग चींटियों की तरह झुण्ड बनाए हुए अपने - अपने दु:खों की गठरियां बांधकर चले जा रहे थे।





सभी ने दु:खों की गठरियों को नदी में फेंका और सुखों को बांधने लगे। सुख तो असंख्य किंतु समय अल्प था। जिसे जितने सुख याद आए , उतने ही सुख उन्होंने अपनी गठरियों में बांध लिए।





भोर होते - होते हुए नगर में पहुंचे। आकाशवाणी सही निकली। जहां रात झोपड़ियां थी , वहां गगनचुंबी महल खड़े थे। जिसने चाहा , वही उसे मिल गया था।





यह सब आश्चर्य था , पर उससे भी बड़ा आश्चर्य यह था कि सभी के चेहरे उदास थे। सब एक - दूसरे को देख कर दु:खी हो रहे थे। दु:ख बदल गए , लेकिन चित्त्त वही थे , अतः दु:खी थे।





लाखों उदास चेहरों में वहां सन्त जुनैद का चेहरा चमक रहा था।





लोगों ने जुनैद से पूछा , ' रात सभी लोग दुःखों का गट्ठर नदी में डालने गए थे। क्या आप नहीं गए ? क्या आपको आनंद नहीं चाहिए ? '





संत ने कहा , ' जिसने खुद को खोज लिया , उसे सुख को बाहर तलाशने की जरूरत नहीं है। मैं जो सुख चाहता हूं , वह मेरे पास है। आत्मा ही मेरी पूंजी है और परमात्मा ही मेरा अंतर - सुख है । '





तभी कई लोगों की भ्रांतियां टूट गई और उन्हें असली सुख की पहचान हो गई।


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