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भगवान की भक्ति ही शरीर का सदुपयोग है bhagwan ki bhakti hi sharir ka sadupyog hai



हर जीव परमात्मा का ही अंश है जो परमात्मा से बिछड़ गया है। इसलिए हर जीव परमात्मा को प्राप्त करने के लिए छटपटा रहा है। परामात्मा से मिलने का आनंद जीव सांसारिक पदार्थों में ढूंढ़ा करता है। किन्तु क्षणभंगुर संसार में वह शाश्वत परम आनंद मिल ही नहीं पाता , क्षणभंगुर विषयों के आनंद में मस्त होकर जीव अपना परम लक्ष्य भुला देता है।






इस प्रकार बार-बार जन्म लेने व मरने के चक्र में फंसकर जीव दुःखी होता रहता है। लेकिन सामान्य तौर पर जीव ऐसा सोचता है कि यदि परमानंद न मिले तो सांसारिक आनंद तो मिले , लेना आनंद ही है क्योंकि यह आनंद से बिछड़ा हुआ उस परमआनंद को ढूंढता फिरता हैं -
आनंद आनंद सब कोई कहे, आनंद गुरु ते जानेयां।
आनंद पाने के लिए तो आज सारी दुनिया दौड़ रही है। खाने-पीने व मौज-मस्ती में लोग आनंद पाने के लिए ही संलग्न होते हैं। किंतु संसार के सभी सुखों का अंत दु:ख के रूप में होता है। अंत में मनुष्य को खाली हाथ ही इस दुनिया से कूच करना पड़ता है।





वास्तव में शाश्वत आनंद पाने की युक्ति तो सद्गुरु की अनुकंपा से ही हासिल होती है। संसार के आनंद तो एक अवधि के बाद निश्चित रूप से समाप्त हो जाते हैं और जीव दु:खी होकर हाथ मलता रह जाता है।






जीव मन की कल्पनाओं में खोया-खोया संसारिक सुखों को ही शाश्वत समझ उसी में लीन हो जाता है। एक दिन ऐसा आता है कि संसार का सारा ऐश्वर्य छोडक़र उसे सदा के लिए इस संसार से विदा हो जाना पड़ता है। लेकिन उल्टे-सीधे विचारों में खोकर मनुष्य परम सत्य सिद्घांत को भूल जाता है और सांसारिकता की बेड़ी में जकड़ा रहता है। इस बात को इस दृष्टांत से समझा जा सकता है।






एक समय की बात है कि सांसारिकता में पूरी तरह से डूबे एक सेठ को देखकर एक महात्मा को दया आ गयी। वे सेठ के पास परलोक सुधारने का उपदेश देने के लिए पहुंचे।





काफी दिनों तक वे सेठ को नाना प्रकार के दृष्टांत देते हुए यह समझाने का प्रयत्न करते रहे कि यह संसार सपने की तरह है। इसका मोह त्याग कर भगवान की भक्ति करने में ही भलाई है। महात्मा के उपदेश को सेठ ढंग से समझ नहीं पाया और सोचा कि ये तो खुद विरक्त संन्यासी हैं और चाहते हैं कि मैं भी घर-बार त्याग दूं।






उसने महात्मा से प्रार्थना की - महाराज! आप की बात पूरी तरह सही है। मैं भी चाहता हूं कि भगवान की भक्ति करना। किंतु अभी बच्चे अबोध हैं , बड़े होने पर जब उनकी शादी कर लूंगा तब परलोक सुधारने का यत्न करूं। तब महात्मा बोले - ये सांसारिक काम तो तेरे न रहने पर भी होते रहेंगे। यह तो तुम्हें अपने घर की चौकीदारी मिली है भगवान द्वारा। लेकिन तुम खुद मालिक बन बैठ गये। ठीक है , तुम अभी अपनी घर-गृहस्थी संभालो। बाद में भगवान की भक्ति कर लेना। लेकिन याद रहे , भवसागर से मुक्ति तो भगवान की भक्ति करने से ही मिलेगी।






सेठ के सभी बच्चे बड़े हुए और शादी होने के बाद अलग हो गये। फिर वह महात्मा सेठ के पास आए और बोले - सेठ जी! अब ईश्वर की कृपा से सब कार्य सिद्घ हो गए हैं , कुछ समय निकाल कर भगवान का भजन-सुमिरन करो। बेड़ा पार हो जाएगा। सेठ बोला - महाराज! अभी तो पोते भी नहीं हुए। पोतों का मुंह तो देख लेने दीजिए। तब महात्मा बोले - मैं तुझे त्यागी बनने के लिए नहीं कहता। तू मूर्खतावश मेरे भाव को नहीं समझ पा रहा है। मेरे कहने का भाव तो यह है कि संसार के मोह और अज्ञानता के चंगुल से मन को हटाकर प्रभु की भक्ति में लगाओ।






तब सेठ बोला - यदि मन प्रभु की भक्ति में लग गया तो संसार के धंधे कौन करेगा? वह मन कहां से लाऊंगा? बिना मन लगाये दुनिया के काम-धंधे और सांसारिक कर्तव्य पूरे नहीं हो पाते।





महात्मा बोले - मैं तुम्हारे ही उद्घार के लिए कह रहा हूं कि बिना भगवान की भक्ति किए कल्याण नहीं होगा। सेठ बोला - पहले संसार के काम-धंधों से मुक्त तो हो लेने दो। परिवार का कल्याण पहले कर लूं , फिर आपकी सुनूंगा।






समय गुजरता गया और एक दिन सेठ का स्वर्गवास हो गया। प्रारब्धवश वह सेठ छोटा कुत्ते के पिल्ला के रूप में पैदा होकर पुन: उसी घर में आ गया। तब उसके पोते ने रसोई में उसे घुसा देखकर जोर से डंडा मारा। डंडा लगते ही वह मर गया और फिर सांप का जन्म लेकर उसी घर में रहने लगा। एक दिन घर वाले सांप देखकर डरे और उसे मार दिया। फिर मोहपाश में बंधकर पुन: उसी घर की गंदी नाली में एक मोटे कीड़े के रूप में पैदा हुआ।






उस कीड़े को देखकर सब घर वाले बड़े विस्मित थे। उन्हीं दिनों वे महात्मा भी घर में पधारे। सबने महात्मा जी को वह मोटा कीड़ा दिखाया। तब अन्तर्दृष्टि से उस महात्मा ने देखा तो पाया कि यह तो वही सेठ है। उसकी ऐसी दुर्गति देखकर उस महात्मा ने अपने जूते से उस पर प्रहार किया जिससे वह कीड़ा वहीं मर गया और सद्गति पाकर अगले जन्म में मानव शरीर पाया और फिर उसी महात्मा का सेवक बना जो उस समय के सद्गुरु भी थे।






यह दृष्टांत कोई ऐसी कथा नहीं जिसके सत्य होने का दावा किया जाए। किंतु इसे असत्य भी नहीं कहा जा सकता। इस दृष्टांत के माध्यम से लोगों को जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पाने के लिए प्रेरणा दी गई है जिससे मनुष्य क्षणभंगुर संसार के मोहपाश में न फंसे और अविनाशी सत्य से जुडऩे की चेष्टा आज और अभी से प्रारंभ कर दें।





अंतत: मनुष्य को परमात्मा की भक्ति करके ही अपना जीवन कृतार्थ करना चाहिए। इसी वजह से सभी महापुरुषों ने मानव शरीर का सदुपयोग भगवान की भक्ति करने में ही बताया है।





गुरुवाणी भी कहती है -
कहु नानक भजु राम नाम नित जाने होत उधार।
अर्थात भगवान के नाम का भजन सुमिरण करने में ही जीवन का अधिकांश समय बिताना चाहिए। ऐसा करने से ही भवसागर से जीव का उद्घार होता है।
वास्तव में संसार के काम धंधे जिनसे पेट भरता है और सांसारिक वैभव व सुख-समृद्घि की अभिवृद्घि होती है किंतु अंत समय में उन्हें यहीं छोडक़र जाना पड़ता है। कोई भी चीज साथ नहीं जाती। अविनाशी प्रभु की भक्ति से जो आनंद मिलता है , वही शरीर छूटने के बाद भी काम आता है। मानव तन के रूप में जीव को एक सुअवसर मिला हुआ है , कभी भी इस मौके से नहीं चूकना चाहिए।






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