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रिश्ते की बुनियाद ही प्रेम है rishte ki buniyad hi prem hai


प्रेम नहीं हो तो रिश्तों में दूसरा कोई भाव अपना असर नहीं दिखाएगा। अगर मामला निजी संबंधों का हो तो उसमें अधिक सावधानी रखना होती है। हमारे सबसे करीबी संबंधों में जीवनसाथी सबसे ऊपर होता है। इस रिश्ते की बुनियाद ही प्रेम है। प्रेम हो यह अच्छा है, लेकिन प्रेम को भी नयापन चाहिए। एक सी अभिव्यक्ति और व्यवहार बोरियत पैदा करता है , रिश्ते में ऊबाउपन आ जाता है





पति-पत्नी के संबंधों में जरूरी है एक दूसरे से जीवंत संवाद होना। इस रिश्ते में एकांत की आवश्यकता होती है। आधुनिक दंपत्तियों की समस्या होती है कि जब वे दोनों एकांत में होते हैं तो बातचीत में कोई तीसरा ही होता है। यह हमेशा याद रखें कि अगर आप अपने दाम्पत्य में प्रेम को जीवित रखना चाहते हैं तो कोशिश करें कि जब भी एकांत में हों तो बातचीत का मुद्दा भी आप दोनों ही रहें। कोई तीसरा व्यक्ति आपकी बातों का विषय ना हो। इससे दो फायदे होते हैं एक तो अपने साथी को समझने का अवसर मिलता है , दूसरा विवाद की संभावना नहीं रहती।





जरूरी नहीं है कि पति-पत्नी एकांत में हों तो कोई गंभीर मुद्दा ही चर्चा में रहे। हल्की-फुल्की बातचीत और हंसी-मजाक भी होते रहना चाहिए।





भागवत के एक प्रसंग में चलते हैं। यहां भगवान कृष्ण का दाम्पत्य चल रहा है। एक दिन रुक्मिणीजी ने भगवान से पूछा कि आपने मुझ से विवाह क्यों किया? रुक्मिणीजी सुंदर थीं , धनाढ्य परिवार से थीं। कृष्ण ने समझ लिया कि उनमें इस बात का अहंकार आ गया है। उन्होंने भी जवाब दिया कि सही है देवी , मैं कहां आपके लायक था।





सारा जीवन दौड़ते-भागते निकल रहा है। चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हूं। जब से पैदा हुआ हूं , कोई ना कोई बिना किसी कारण मुझसे युद्ध करने चला आता है। मैं कहां आपके लायक था बड़ी मुश्किल से राज्य और परिवार को चला रहा हूं। आपका अहसान है कि आपने मुझसे विवाह कर लिया।





रुक्मिणी जी शर्म से पानी-पानी हो गईं। माफी मांगने लगीं। तब भगवान ने कहा नहीं देवी , माफी की जरूरत नहीं है , मैं तो सिर्फ हास्य विनोद के लिए ऐसा कह रहा था।





भगवान कहते हैं अपनी पत्नी से दाम्पत्य में हास्य-विनोद करते रहने चाहिए यह भागवत में श्लोक लिखा है।





देखिए भागवत दाम्पत्य के छोटी-छोटी बातों पर प्रकाश डालता है तो भागवत में यह श्लोक इसीलिए आया कि उनका कहना है कि दाम्पत्य में पत्नी-पत्नी के बीच हंसी-मजाक भी होते रहना चाहिए।





हमेशा गंभीर न हो जाएं क्योंकि भगवान जानते थे कि दाम्पत्य में अनेक निर्णय , अनके स्थितियां ऐसी आती हैं कि अकारण तनाव आ जाता है।। तो अब आपका तनाव दूर करने कौन आएगा खुद ही को करना है और दोनों के बीच का करना है और आपसी समझ से होगा।





भगवान कहते हैं हास्य-विनोद बनाए रखिए। कभी-कभी एक दूसरे को हंसाने का प्रयास करिए। और यह बात तो समझ लो आप कि दाम्पत्य तो हम को खुद ही चलाना है।


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