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जब हनुमान जी ने तीनों का घमंड चूर - चूर कर दिया jab Hanuman Ji ne teeno Ka ghamand choor - choor Kar Diya

संसार में किसी का कुछ नहीं। ख्वाहमख्वाह अपना समझना मूर्खता है, क्योंकि अपना होते हुए भी, कुछ भी अपना नहीं होता। इसलिए हैरानी होती है, घमण्ड क्यों ? किसलिए ? किसका ? कुछ रुपये दान करने वाला यदि यह कहे कि उसने ऐसा किया है, तो उससे बड़ा मुर्ख और कोई नहीं और ऐसे भी हैं, जो हर महीने लाखों का दान करते हैं, लेकिन उसका जिक्र तक नहीं करते, न करने देते हैं। वास्तव में जरूरतमंद और पीड़ित की सहायता ही दान है, पुण्य है। ऐसे व्यक्ति पर सरस्वती की सदा कृपा होती है| पर क्या किया जाए, देवताओं तक को अभिमान हो जाता है और उनके अभिमान को दूर करने के लिए परमात्मा को ही कोई उपाय करना पड़ता है। गरुड़, सुदर्शन चक्र तथा सत्यभामा को भी अभिमान हो गया था और भगवान श्रीकृष्ण ने उनके अभिमान को दूर करने के लिए श्री हनुमान जी की सहायता ली थी। श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को स्वर्ग से पारिजात लाकर दिया था और वह इसीलिए अपने आपको श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिया और अति सुंदरी मानने लगी थी। सुदर्शन चक्र को यह अभिमान हो गया था कि उसने इंद्र के वज्र को निष्क्रिय किया था। वह लोकालोक के अंधकार को दूर कर सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ...

भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने वाले का विनाश निश्चित हैं। Bhagya ke bharose hath per hath dharkar baithe rahane wale ka vinash nishchit hai.

एक नदी के किनारे उसी नदी से जुडा एक बडा जलाशय था। जलाशय में पानी गहरा होता हैं, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं। ऐसे स्थान मछलियों को बहुत रास आते हैं। उस जलाशय में भी नदी से बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी। अंडे देने के लिए तो सभी मछलियां उस जलाशय में आती थी। वह जलाशय लम्बी घास व झाडियों द्वारा घिरा होने के कारण आसानी से नजर नहीं आता था। उसी मे तीन मछलियों का झुंड रहता था। उनके स्वभाव भिन्न थे। अन्ना संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। प्रत्यु कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने का यत्न करो। यद्दी का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता जो किस्मत में लिखा है, वह होकर रहेगा। एक दिन शाम को मछुआरे नदी में मछलियां पकडकर घर जा रहे थे। बहुत कम मछलियां उनके जालों में फंसी थी। अतः उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाडियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड जाता दिकाई दिया। सबकी चोंच में मछलियां दबी थी। वे चौंके । एक ने अनुमान लगाया “दोस्तो! लगता हैं झाडियों के पीछे नदी से जुडा जलाशय ह...

जानें भगवान शंकर के पूर्ण रूप काल भैरव की महिमा jaane bhagwan Shankar ke purn roop kaal bhairav mahima

भगवान शंकर के पूर्ण रूप काल भैरव एक बार सुमेरु पर्वत पर बैठे हुए ब्रम्हाजी के पास जाकर देवताओं ने उनसे अविनाशी तत्व बताने का अनुरोध किया। शिवजी की माया से मोहित ब्रह्माजी उस तत्व को न जानते हुए भी इस प्रकार कहने लगे - मैं ही इस संसार को उत्पन्न करने वाला स्वयंभू, अजन्मा, एक मात्र ईश्वर , अनादी भक्ति, ब्रह्म घोर निरंजन आत्मा हूँ। मैं ही प्रवृति उर निवृति का मूलाधार , सर्वलीन पूर्ण ब्रह्म हूँ। ब्रह्मा जी ऐसा की पर मुनि मंडली में विद्यमान विष्णु जी ने उन्हें समझाते हुए कहा की मेरी आज्ञा से तो तुम सृष्टी के रचियता बने हो, मेरा अनादर करके तुम अपने प्रभुत्व की बात कैसे कर रहे हो ? इस प्रकार ब्रह्मा और विष्णु अपना-अपना प्रभुत्व स्थापित करने लगे और अपने पक्ष के समर्थन में शास्त्र वाक्य उद्घृत करने लगे। अंततः वेदों से पूछने का निर्णय हुआ तो स्वरुप धारण करके आये चारों वेदों ने क्रमशः अपना मत इस प्रकार प्रकट किया - ऋग्वेद- जिसके भीतर समस्त भूत निहित हैं तथा जिससे सब कुछ प्रवत्त होता है और जिसे परमात्व कहा जाता है, वह एक रूद्र रूप ही है। यजुर्वेद- जिसके द्वारा हम वेद भी प्रमाणित होते हैं तथा जो ईश...

एकलव्य की गुरुभक्ति eklavya ki guru bhakti

एकलव्य की गुरुभक्ति eklavya ki guru bhakti आचार्य द्रोणाचार्य पाण्डव तथा कौरव राजकुमारों को अस्त्र-शस्त्र की विधिवत शिक्षा प्रदान कर रहे थे। उन राजकुमारों में अर्जुन के अत्यन्त प्रतिभावान तथा गुरुभक्त होने के कारण वे द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे। द्रोणाचार्य का अपने पुत्र अश्वत्थामा पर भी विशेष अनुराग था, इसलिये धनुर्विद्या में वे भी सभी राजकुमारों में अग्रणी थे, किन्तु अर्जुन अश्वत्थामा से भी अधिक प्रतिभावान थे। एक रात्रि को गुरु के आश्रम में जब सभी शिष्य भोजन कर रहे थे, तभी अकस्मात हवा के झौंके से दीपक बुझ गया। अर्जुन ने देखा अन्धकार हो जाने पर भी भोजन के कौर को हाथ मुँह तक ले जाता है। इस घटना से उन्हें यह समझ में आ गया कि निशाना लगाने के लिये प्रकाश से अधिक अभ्यास की आवश्यकता है। अब उन्होंने रात्रि के अन्धकार में भी लक्ष्य भेदने का अभ्यास करना आरम्भ कर दिया। गुरु द्रोण उनके इस प्रकार के अभ्यास से अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने अर्जुन को धनुर्विद्या के साथ ही साथ गदा, तोमर, तलवार आदि शस्त्रों के प्रयोग में भी निपुण कर दिया। उन्हीं दिनों हिरण्यधनु नामक निषाद का पुत्र एकलव्य भी धनुर्वि...

भीष्म पितामह का जन्म और उनकी अखंड प्रतिज्ञा bhishm pitamah ka janm aur unki akhand pratigya

भीष्म पितामह का जन्म और उनकी अखंड प्रतिज्ञा bhishm pitamah ka janm aur unki akhand pratigya एक बार हस्तिनापुर के महाराज प्रतीप गंगा के किनारे तपस्या कर रहे थे। उनके रूप-सौन्दर्य से मोहित होकर गंगा उनकी जाँघ पर आकर बैठ गईं। गंगा ने कहा- "हे राजन! मैं ऋषि की पुत्री गंगा हूँ और आपसे विवाह करने आपके पास आई हूँ।" इस पर महाराज प्रतीप बोले- "गंगे! तुम मेरी दहिनी जाँघ पर बैठी हो। पत्नी को तो वामांगी होना चाहिये, दाहिनी जाँघ तो पुत्र का प्रतीक है, अतः मैं तुम्हें अपनी पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करता हूँ।" यह सुन कर गंगा वहाँ से चली गईं। अब महाराज प्रतीप ने पुत्र प्राप्ति के लिये घोर तप करना आरम्भ कर दिया। उनके तप के फलस्वरूप उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम उन्होंने शान्तनु रखा। शान्तनु के युवा होने पर उसे गंगा के साथ विवाह करने का आदेश देकर महाराज प्रतीप स्वर्ग चले गये। पिता के आदेश का पालन करने के लिये शान्तनु ने गंगा के पास जाकर उनसे विवाह करने के लिये निवेदन किया। गंगा बोलीं- "राजन! मैं आपके साथ विवाह तो कर सकती हूँ, किन्तु आपको वचन देना होगा कि आप मेरे किस...

जीवन में सबसे अधिक बलशाली आत्मबल है। Jivan mein sabse adhik balshali aatmabal hai.

थैला सुंदर लेकिन उसमें गेहूं ही नहीं, तिजोरी आकर्षक लेकिन उसमें संपत्ति ही नहीं, मकान मनमोहक पर उसमें मालिक ही नहीं, शरीर खूबसूरत पर उसमें प्राण ही नहीं………… क्या फायदा ? संपत्ति अथाह, लोकप्रियता बेमिसाल, तप की पूंजी भी अद्भुत, विडंबना यह है कि आत्मविश्वास बिल्कुल नहीं…… क्या फायदा ? संपत्ति से दरिद्र, लोकप्रियता बिल्कुल नहीं, और तपस्या भी मामूली, लेकिन आत्मविश्वास आसमान को छूता हुआ…. तकलीफ क्या ? सुख में यदि दिमाग ठिकाने पर रखना है, और दु:ख में टूट नहीं जाना है, निष्फलता में यदि निराश नहीं होना है और सफलता में पागल नहीं बन जाना है तो तुम्हारे पास दूसरी कोई पूंजी हो या ना हो, प्रचंड आत्माविश्वास की पूंजी तो होनी ही चाहिए। जैसे संपत्ति में क्रयशक्ति की ताकत है वैसे आत्मविश्वास में प्रसन्नता की ताकत निहित है। दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के इस युग ने इंसान के सामने सुख-सुविधा के साधनों का अंबार खड़ा करके उसके आत्मविश्वास को वेंटिलेटर पर रख दिया है। परीक्षा में अंक कम मिलते हैं, विद्यार्थी आत्महत्या कर लेता है। बाजार में मंदी आती है, व्यापारी जीवन समाप्त कर लेता है। सास...

कष्ट तो आप की परीक्षा करते है, कि आप सफलता के लिए कितने योग्य है ? Kasht Tu aapki pariksha karte hai, ki aap safalta ke liye kitni yogya Hain ?

बाल मंदिर की परीक्षा…… आठवीं की परीक्षा……. हायर सेकंडरी की परीक्षा….. बी.कॉम. की परीक्षा…. सी.ए. की परीक्षा.….. आई.आई.टी. की परीक्षा.….. उत्तरोत्तर अधिक से अधिक कठिन ही रहनेवाली हैं। जमीन पर चलना….. छत पर पहुंचना…… टेकरी पर चढ़ना….. पर्वत के शिखर पर पहुंचना…… उत्तरोत्तर अधिक से अधिक कठिन ही रहने वाला है। यदि तुमने सरल को पसंद कर लिया तो तुम्हें जो पुरस्कार मिलेगा वह मामूली ही मिलेगा और कठिन की चुनौती को यदि तुम ने स्वीकार कर लिया तो तुम्हें मिलने वाला पुरस्कार तुम्हें निहाल कर देगा। परन्तु…… मानव यह मान बैठा है कि जीवन कष्ट बिना का होना चाहिए। कष्ट विकास में 'बाधक' है और प्रसन्नता के दुश्मन हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि सूर्य के प्रचंड ताप के बिना वृक्ष को मजबूती नहीं मिलती। आग की भयंकर गर्मी के बिना घड़े को मजबूती नहीं मिलती। छैनी की मार खाए बिना पत्थर को प्रतिमा बनने का गौरव नहीं मिलता। प्रसूति की वेदना सहन किए बिना स्त्री को पुत्र दर्शन का सौभाग्य नहीं होता। साधनाजन्य कष्ट सहन किए बिना साधक को सिद्धि नहीं मिलती। यह समस्त वास्तविकता यही कहती है कि कष्ट जीवन में अनिवार्य ही है...