थैला सुंदर लेकिन उसमें गेहूं ही नहीं, तिजोरी आकर्षक लेकिन उसमें संपत्ति ही नहीं, मकान मनमोहक पर उसमें मालिक ही नहीं, शरीर खूबसूरत पर उसमें प्राण ही नहीं…………
क्या फायदा ?
संपत्ति अथाह, लोकप्रियता बेमिसाल, तप की पूंजी भी अद्भुत, विडंबना यह है कि आत्मविश्वास बिल्कुल नहीं……
क्या फायदा ?
संपत्ति से दरिद्र, लोकप्रियता बिल्कुल नहीं, और तपस्या भी मामूली, लेकिन आत्मविश्वास आसमान को छूता हुआ…. तकलीफ क्या ?
सुख में यदि दिमाग ठिकाने पर रखना है, और दु:ख में टूट नहीं जाना है, निष्फलता में यदि निराश नहीं होना है और सफलता में पागल नहीं बन जाना है तो तुम्हारे पास दूसरी कोई पूंजी हो या ना हो, प्रचंड आत्माविश्वास की पूंजी तो होनी ही चाहिए।
जैसे संपत्ति में क्रयशक्ति की ताकत है वैसे आत्मविश्वास में प्रसन्नता की ताकत निहित है।
दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के इस युग ने इंसान के सामने सुख-सुविधा के साधनों का अंबार खड़ा करके उसके आत्मविश्वास को वेंटिलेटर पर रख दिया है।
परीक्षा में अंक कम मिलते हैं, विद्यार्थी आत्महत्या कर लेता है।
बाजार में मंदी आती है, व्यापारी जीवन समाप्त कर लेता है।
सास के साथ मेल नहीं खाता, बहू जलकर मर जाती है।
अरे, पिता बेटे को कठोर शब्दों में डांट देता है, बेटा पंखे से लटक कर खुद को खत्म कर लेता है।
ऐसे कमजोर आत्मविश्वास के साथ जीवन जी रहे लोगों का भविष्य क्या होगा ? अंधकारमय !
कारण ?
यदि शरीर में बीमारियों का आगमन अनिवार्य है तो जीवन में कष्टों का आगमन भी अनिवार्य ही है।
इन दोनों स्थितियों में तुम जीवन को तभी टिका सकते हो जब तुम्हारे पास आत्मविश्वास भरपूर हो। उसके अभाव में श्मशान के सिवा अन्य कोई मंजिल हो ही नहीं सकती।
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