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प्रेम भरा व्यवहार हमें लोगों से जोड़ता है। Prem bhara vyavahar hamen logon se jodta hai

प्रेम के बिना मानव जीवन का कोई अर्थ नहीं होता। प्रेम और भक्ति में जब समर्पण की भावना जुड़ जाती है तब एक शक्ति का निर्माण होता है। जीवन के लिए संजीवनी है प्रेम। क्योंकि प्रेम परमात्मा की एक अनुपम देन है। मनुष्य को परमात्मा ने अनेक प्रकार की विशिष्टताओं से युक्त बनाया है। उसमें सबसे बड़ी विशिष्टता यह डाली है कि मनुष्य किसी को भी प्रेम करके अपना बना सकता है। सच पूछिए तो प्रेम के माध्यम से हिंसक जन्तुओं पर काबू पाने की घटनाएं तो देखी ही जाती हैं किंतु पत्थर से भी परमात्मा को प्रकट कर लेने के अनेक उदाहरण इतिहास में मौजूद हैं। प्रेम भरा व्यवहार हमें लोगों से जोड़ता है। जबकि नफरत करने से अपने सगे भी दुश्मन की तरह पेश आने लगते हैं। इसलिए प्रेम को सबसे सुन्दर हथियार बताया गया है , जिसके द्वारा सबको आसानी से अपने वश में किया जा सकता है। इसलिए रात को जब हम सोने जा रहे हैं तब मन ही-मन ईश्वर को याद करें और जो भी बात हमारे मन में हो , उसे अपनी आत्मा की आवाज में उनसे प्रेम पूर्वक कह डालें। इससे हमारा ईश्वर के साथ सीधा वार्तालाप करने का मार्ग खुल जाता है। ईश्वर तो पहले से ही जानते हैं , लेकिन उनके साम...

पड़े निन्यानवे के चक्कर में pade Ninyanve ke chakkar mein

सेठ करोड़ी मल पैसे से तो करोड़पति था मगर खर्च करने के मामले में महाकंजूस। उसका ये हाल था कि चमड़ी जाये पर दमड़ी न जाए। उस की इस आदत से उसके बीवी बच्चे बहुत परेशान थे। सब कुछ होते हुए भी करोड़ी मल खाने पीने तक में कंजूसी करता था। उसका बस चले तो घर में आलू और दाल के अलावा कुछ नहीं बनना चाहिये। सेठ के पड़ौस में ही कल्लू नाम के एक ग़रीब मज़दूर का घर था। कल्लू एक दम फक्कड़ों की तरह रहता था। जो भी कमाता था , अपने बीवी बच्चों के खाने पिलाने में खर्च कर देता था। उस के घर में रोज़ हलवा पूरी बनते थे और वो सीना तान कर मस्ती की चाल से चलता था। कल्लू के रहन सहन को देख कर सेठ के बड़े लड़के लक्ष्मी नारायण को बहुत कष्ट होता था। एक दिन जब उस से रहा नहीं गया तो बाप से जाकर बोला , “ पिताजी क्या बात है कि हमारे पास सब कुछ होते हुए भी हम ग़रीबों की तरह रहते हैं , छोटी-छोटी चीज़ों के लिए आप के आगे हाथ फैलाना पड़ता है। ज़रा उधर कल्लू को तो देखो। ग़रीब मज़दूर है मगर दिल बादशाहों जैसा है। तबियत से बाल बच्चों पर खर्च करता है और मस्त रहता है। आखिर बात क्या है। ” सेठ ने लक्ष्मी नारायण की बात बहुत ग़ौर से सुनी...

शरीर के साथ ये संतुलन जीवन को सुखी बनाता है… sharir ke sath yah santulan jivan ko sukhi banata hai...

मनुष्य शरीर और आत्मा दोनों से बना है , लेकिन इस सिद्धांत को व्यावहारिक रूप से समझना होगा। जीवन में जो भी क्रिया करें , दोनों को समझकर करें। केवल शरीर पर टिककर करेंगे तो जीवन भौतिकता में ही डूब जाएगा और केवल आत्मा से जोड़कर करेंगे तो अजीब-सी उदासी जीवन में होगी। न बाहर से कटना है और न बाहर से पूरी तरह जुड़ना है। दोनों का संतुलन रखिए। जैन संत तरुणसागरजी दो घटनाएं शरीर से जुड़ी सुनाते हैं। महावीर स्वामी पेड़ के नीचे ध्यानमग्न बैठे थे। पेड़ पर आम लटक रहे थे। बच्चों ने आम तोड़ने के लिए पत्थर फेंके। कुछ पत्थर आम को लगे और एक महावीर स्वामी को लगा। बच्चों ने कहा - प्रभु! हमें क्षमा करें , हमारे कारण आपको कष्ट हुआ है। प्रभु बोले - नहीं , मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ। बच्चों ने पूछा - तो फिर आपकी आंखों में आंसू क्यों? महावीर ने कहा - पेड़ को तुमने पत्थर मारा तो इसने तुम्हें मीठे फल दिए , पर मुझे पत्थर मारा तो मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सका , इसलिए मैं दु:खी हूं। यहां शरीर का महत्व बताया गया है। आखिर इस शरीर पर किसका अधिकार है? माता-पिता कहते हैं - संतान मेरी है। पत्नी कहती है - मैं अपने माता-पिता को छोड़...

अपनी कमजोरी को भी अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। Apni kamjori ko bhi apni sabse badi takat banaya

जापान के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले दस वर्षीय ओकायो को जूडो सीखने का बहुत शौक था । पर बचपन में हुई एक दुर्घटना में बायाँ हाथ कट जाने के कारण उसके माता -पिता उसे जूडो सीखने की आज्ञा नहीं देते थे । अब वो बड़ा हो रहा था और उसकी जिद्द भी बढती जा रही थी । अंततः माता -पिता को झुकना ही पड़ा और वो ओकायो को नजदीकी शहर के एक मशहूर मार्शल आर्ट्स गुरु के यहाँ दाखिला दिलाने ले गए । गुरु ने जब ओकायो को देखा तो उन्हें अचरज हुआ कि , बिना बाएँ हाथ का यह लड़का भला जूडो क्यों सीखना चाहता है ? उन्होंने पूछा , “ तुम्हारा तो बायाँ हाथ ही नहीं है तो भला तुम और लड़कों का मुकाबला कैसे करोगे । ” “ ये बताना तो आपका काम है " , ओकायो ने कहा। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मुझे सभी को हराना है और एक दिन खुद मास्टर बनना है । ” गुरु उसकी सीखने की दृढ इच्छा शक्ति से काफी प्रभावित हुए और बोले , “ ठीक है मैं तुम्हे सीखाऊंगा लेकिन एक शर्त है , तुम मेरे हर एक निर्देश का पालन करोगे और उसमे दृढ विश्वास रखोगे । ” ओकायो ने सहमती में गुरु के समक्ष अपना सर झुका दिया । गुरु ने एक साथ लगभग पचास छात्रों को जूडो सीखना शु...

हर परिणाम के पीछे कोई कर्म जरूर होता है Har parinaam ke piche koi karma jarur hota hai

कोई कितना भी आधुनिक हो जाए , कभी ना कभी भगवान , भाग्य जैसी बातों में विश्वास करता ही है। बड़े-बड़े आधुनिक लोगों को किस्मत के भरोसे देखा गया है। किस्मत को मानना अलग बात है और भाग्य के भरोसे बैठना दूसरी बात है। हमारे निजी विचार ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। आप जैसा सोचते हैं , जैसा मानते हैं व्यक्तित्व वैसा ही बनता जाता है। हमारे विचारों की साफ झलक व्यक्तित्व में दिखाई देती है। अगर आप भाग्यवादी हैं। किस्मत में अत्यधिक भरोसा करते हैं तो वैसा ही परिणाम आपको अपने कामों का मिलता है। अपने व्यक्तित्व को ऐसे निखारें कि उस पर कर्म का प्रभाव दिखे। इस बात को समझें कि व्यक्तित्व पर कर्म का प्रभाव प्रकाश देता है , भाग्यवाद इसे धुंधला बनाता है। कर्मवादियों के कामों के परिणाम का अनुमान आसानी से लगाया सकता है लेकिन भाग्यवाद में कर्मों के परिणाम का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। ये सदैव याद रखें कि भाग्य कर्म से ही बनता है। हम जैसे काम करते हैं वैसा ही हमारे भाग्य का निर्माण होता है। हम अपने कर्म पर टिकें। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम कर्म तो बहुत करते हैं , लेकिन फिर भी परिणाम विपरीत आते हैं।...

नित अभ्यास से दर्शन कर सकते हैं ईश्वर का Nit abhyas se darshan kar sakte hain ishwar ka

सभी शास्त्र कहते हैं कि बिना भगवान को प्राप्त किये मुक्ति नहीं मिल सकती है। इसलिए भगवान की तलाश के लिए कोई व्यक्ति मंदिर जाता है तो कोई मस्जिद , कोई गुरूद्वारा , तो कोई गिरजाघर। लेकिन इन सभी स्थानों में जड़ स्वरूप भगवान होता है। अर्थात ऐसा भगवान होता है जिसमें कोई चेतना नहीं होती है। असल में भगवान की चेतना तो अपने भक्तों के साथ रहती है इसलिए मंदिर में हम जिस भगवान को देखते हैं वह मौन होकर एक ही अवस्था में दिखता है। जब हमारी चेतना यानी इन्द्रियां अपने आस-पास ईश्वर को महसूस करने लगती है तब हम जहां भी होते हैं वहीं ईश्वर प्रकट दिखाई देता है। उस समय भगवान को ढूंढने के लिए मंदिर या किसी तीर्थ में जाने की आवश्यकता नहीं होती है। जब व्यक्ति इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है तब व्यक्ति के साथ चल रही भगवान की चेतना व्यक्ति के मंदिर में प्रवेश करने पर मंदिर में मौजूद ईश्वर की प्रतिमा में समा जाती है और मूक बैठी मूर्ति बोलने लगती है। यह उसी प्रकार होता है जैसे मृत शरीर में आत्मा के प्रवेश करने पर शरीर में हलचल होने लगती है। शरीर की क्रियाएं शुरू हो जाती है। मंदिर में विराजमान मूर्ति वास्तव में एक मृ...

जब हवा चलती है तो मैं सोता हूँ jab hawa chalti hai to main sota hun

बहुत समय पहले की बात है , आइस्लैंड के उत्तरी छोर पर एक किसान रहता था । उसे अपने खेत में काम करने वालों की बड़ी ज़रुरत रहती थी। लेकिन ऐसी खतरनाक जगह , जहाँ आये दिन आंधी - तूफ़ान आते रहते हों , कोई काम करने को तैयार नहीं होता था । किसान ने एक दिन शहर के अखबार में इश्तहार दिया कि उसे खेत में काम करने वाले एक मजदूर की ज़रुरत है । किसान से मिलने कई लोग आये लेकिन जो भी उस जगह के बारे में सुनता , वो काम करने से मना कर देता . अंततः एक सामान्य कद का पतला -दुबला अधेड़ व्यक्ति किसान के पास पहुंचा। किसान ने उससे पूछा , “ क्या तुम इन परिस्थितयों में काम कर सकते हो ? ” “ ह्म्म्म , बस जब हवा चलती है तब मैं सोता हूँ । ” व्यक्ति ने उत्तर दिया । किसान को उसका उत्तर थोडा अजीब लगा लेकिन चूँकि उसे कोई और काम करने वाला नहीं मिल रहा था इसलिए उसने व्यक्ति को काम पर रख लिया। मजदूर मेहनती निकला , वह सुबह से शाम तक खेतों में मेहनत करता , किसान भी उससे काफी संतुष्ट...