
वैदिक काल में सुभाष नाम का एक विद्यार्थी गुरुदेव के चरणों में विद्या अध्ययन करने गया। विद्या के साथ में पूरी तन्मयता के साथ में गुरु भक्ति में लग गया। ऐसी गुरु भक्ति की ऐसी गुरु सेवा की, कि गुरू के हृदय में बस गया। गुरु का हृदय जीत लिया।
विद्या उपार्जन के बाद जब अपने घर जाने के लिए निकला गुरु जी ने कहा,"बेटा आपने मेरा दिल जीत लिया है, पर हम तो साधारण साधु हैं।हमारे पास धन-दौलत राज्य सत्ता कुछ नहीं है अब तुझे क्या दूं बेटा जिससे तेरा कल्याण हो जाए ऐसा कहते हुए उन्होंने अपनी छाती का एक बाल उखाड़ कर उसे देते हुए कहा - बेटा ले इसे प्रसाद समझकर संभाल के रख ले। जब तक यह तेरे पास रहेगा धन - वैभव - संपत्ति -लक्ष्मी की कोई कमी नहीं रहेगी।
गुरुदेव," आपने मुझे पहले ही सब कुछ दे दिया है।"
वह तो है ! फिर भी मेरी खुशी के लिए रख ले।
सुभाष ने खूब आदर पूर्वक बाल को रख लिया।उसकी सेवा पूजा करता था। घर में सुख शांति समृद्धि का वास हो गया वह धनवान हो गया उसकी ख्याति चारों तरफ फैल ने लग गई।
सुभाष के पड़ोसी ने देखा और सोचा यह भी विद्या ग्रहण करके आया है , और मैं भी विद्या ग्रहण करके आया हूं, और सुभाष से कुछ ज्यादा ही मैंने विद्या ग्रहण की है। फिर भी इसके पास मुझसे ज्यादा वैभव, मुझसे ज्यादा धन है। पूरे नगर में इसका मान है, सनमान है, और मुझे कोई पूछता तक नहीं है।
पड़ोसी ने सुभाष से पूछताछ की, सुभाष भोला सरल सच्चे हृदय वाला था। उसने उसे बताया कि यह सब मेरे गुरु की कृपा है मुझ पर, मैंने हृदय से उनकी सेवा की और प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे घर आते वक्त अपने छाती का एक बाल दिया उस बाल कि मैं रोज पूजा करता हूं और यह सब धन - वैभव - संपन्नता ,उसी का दिया हुआ है।
पड़ोसी ने सुभाष से गुरु जी का नाम पता पूछा और गुरु को मिलने निकल पड़ा। गुरु के पास पहुंचकर गुरु को प्रणाम किया और कहां,"गुरुजी ! मैं सुभाष का पड़ोसी हूं आपका नाम सुनकर आपके पास आया हूं। अच्छा ! गुरुजी बोले। गुरुजी ! मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं। गुरु जी ने कहा मेरी कोई सेवा नहीं है। पड़ोसी फिर भी आग्रह करके उनके आश्रम में रुक गया।
मन के अंदर तो धन वैभव प्राप्त करने की वासना कूट-कूट कर भरी हुई थी। इसीलिए पूरे दिन भर इधर-उधर खुद फांद करता रहा दिखावे के लिए काम करता रहा । शाम होते ही गुरु जी से कहा -
गुरुजी ! आप दयालु हो, सुभाष को आपने धन्य किया है मुझ पर भी कृपा करो । मेरी भी इच्छा पूर्ण करो।
क्या इच्छा पूरी करू।
मुझे भी आपका बाल उखाड़ कर दीजिए।
"अरे भाई ! इसमें उसका प्रारब्ध का जोर है, मेरा कोई चमत्कार नहीं है।
पड़ोसी विचार करने लगा कि गुरु जी के छाती के बाल में अगर इतनी ताकत है तो उनकी जटाओं में कितनी ताकत होगी। तुरंत ही गुरु जी के जटाओं में से चार पांच बाल झपट कर भाग गया । गुरु जी ने कहा -तुझे बाल से इतना प्रेम है, तो जा तुझे आज के बाद बाल ही बाल मिलेंगे।
पड़ोसी घर आ गया। भोजन करने बैठा तो थाली में बाल, पूजा करने बैठा तो पूजा की थाली में बाल कुछ भी काम करें तो बाल ही बाल दिखे परेशान हो गया ।
उस की ऐसी हालत क्यों हुई ? काम और संकल्प के अधीन था। सुभाष सुखी क्यों था ?
काम और संकल्प रहीत गुरु सेवा को तन्मय से करने से धन ,मान, यश ,सुख ,शांति उसके पीछे पीछे चली आई।
गुरु की सेवा ही सर्वोत्तम धर्म है।
Comments
Post a Comment