
एक महिला ने प्रवचन - कथा में सुना की सत्संग से वैकुंठ मिलता है, क्योंकि संत हरिद्वार है और सत्संग गंगा स्नान है।
दूसरे दिन जाकर उसने पति से कहा - देखो, एक बहुत बड़े संत आए हैं और उनका सत्संग चल रहा है। सारा गांव सत्संग का लाभ ले रहा है। बड़ा आनंद बरस रहा है, तुम भी सत्संग का लाभ लो क्योंकि सत्संग का फल वैकुंठ है। पत्नी के विशेष आग्रह पर वह दूसरे दिन सत्संग में गया। वहां जाकर सत्संग में बैठा और 10:15 मिनट बाद बार बार इधर-उधर देखने लगा कि वैकुंठ ले जाने वाला कोई विमान आया या नहीं। घंटा भर वह बैठा रहा वहां। विमान कहां से आना था ?जब उसे लगा कि अब कोई विमान आने वाला नहीं है, कोई वैकुंठ मिलने वाला नहीं है तो गुस्से से उठा और संत को भला - बुरा कहते कहते - सत्संग से बाहर निकल गया।
घर जा रहा था। गुस्से में तो था ही। रास्ते में नारद जी मिल गए। नारद ने पूछा -भाई! क्या बात है? किसे गाली दे रहे हो? बोला -यह संत लोग बड़े धोखेबाज होते हैं । जनता को गुमराह करते हैं कि सत्संग से वैकुंठ मिलता है। अरे! मैं वहां घंटा पर बैठा ,पर वहां वैकुंठ तो क्या एक कप चाय भी नहीं मिली।
उस आदमी ने नारद से पूछा कि आप ही बताइए सत्संग का क्या महत्व है ? क्या सत्संग से वाकई में वैकुंठ मिलता है ?
नारद ने कहा : भाई ! सत्संग तो मैं भी करता हूं लेकिन सत्संग का महत्व मुझे भी नहीं मालूम।
भारत ने कहा-अच्छा ! ऐसा करते हैं शंकर जी से चलकर पूछते हैं, वही बताएंगे कि सत्संग का क्या महत्व है?
नारद उस व्यक्ति को लेकर शंकर जी के पास पहुंचे। शंकर जी से नारद ने पूछा - महाराज सत्संग का महत्व बताइए। यह व्यक्ति जानना चाहता है । शंकर जी बोले-भाई सत्संग का महत्व मैं भी नहीं जानता । अच्छा ! हम ब्रह्मा जी के पास चलते हैं । वे ही सत्संग का महत्व बताएंगे।
शंकर जी, नारद और वह व्यक्ति तीनों चलकर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे भी यही प्रश्न किया । सत्संग का क्या महत्व है । यह बताइए। ब्रह्मा जी तो मुश्किल में पड़ गए । बोले - भाई, मुझे तो मालूम नहीं। इसका उत्तर तो विष्णु जी ही दे सकते हैं । अपन विष्णु जी के पास चलते हैं।
वे सभी वैकुंठ धाम पहुंचे तो वहां विष्णु जी विराजमान थे । विष्णु जी ने देखा कि आज तो बड़े-बड़े महापुरुष एक साथ आए हैं । कारण पूछा तो नारद ने कहा - भगवान! यह व्यक्ति सत्संग का महत्व जानना चाहता है और हम में से किसी को सत्संग का महत्व मालूम नहीं है इसीलिए आपके पास आए हैं। कृपया ,सत्संग का महत्व समझाएं । विष्णु जी ने उसी व्यक्ति से पूछा - बोले भाई! तूने अभी तक सत्संग का क्या महत्व सुना था ? उस व्यक्ति ने कहा - मैंने सुना था कि सत्संग से वैकुंठ मिलता है। मैंने घंटे भर का सत्संग किया ; पर मुझे तो कोई वैकुंठ नहीं मिला।
विष्णु जी ने उसके कान पकड़कर कहा । अरे भोले प्राणी ! साक्षात ब्रह्मा , विष्णु महेश तेरे सामने खड़े हैं - तो यह वैकुंठ नहीं तो क्या तेरा घर है ? अगर तू घंटे भर का सत्संग नहीं करता तो तू क्या यहां तक आ सकता था ? देख घंटे भर के सत्संग का फल है कि तीन - - तीन देव तेरे सामने खड़े हैं । श्रद्धा बड़ी चीज है । श्रद्धा ही फल देती है।
तो सत्संग का जीवन में बड़ा गहरा महत्व है।
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