Skip to main content

जीवन मुक्ति की अभिलाषा jivan mukti ki abhilasha

मनुष्य में पलायन की प्रवृत्ति घर कर गई है। वह अपने वर्तमान को एक सजा के रूप में मानता है। वह सोचता है कि मनुष्य - जन्म झंझटों से भरा हुआ है। उस ऐसा सिखा दिया जाता है कि इससे मुक्त होना ही परमानंद की स्थिति है। वह जीवन जीने का प्रयास कम करता है और इससे मुक्त होने का प्रयास ज्यादा करता है। नाना प्रकार की कहानियां वह निर्मित कर देता है। अनेक रास्तों की परिकल्पना वह कर लेता है, जिनका कोई आधार नहीं होता है, जिनका कोई प्रमाण नहीं होता है। बस किसी भी कह दिया, कहीं पढ़ लिया और उस पर भरोसा कर अपने जीवन को दांव पर लगा दिया। आश्चर्यजनक बात यह है कि जितने मुंह उतनी बातें। मुक्त होने के रास्ते भी हर व्यक्ति के अलग-अलग हैं‌। सबको लगता है कि मेरा रास्ता सही है बाकी सबके गलत है। इस मुक्त होने की चाहत में व्यक्ति पता नहीं क्या-क्या कर बैठता है।
हकीकत में यह जीवन से पलायन है। अभी तो जीवन मिला है, उसे सुंदर बनाने की कोई जिम्मेदारी नहीं है क्या? इसको झंझट भरा मानकर क्या परमात्मा द्वारा दिए गए तोहफे का अपमान नहीं कर रहे हो। कोई आपको खूबसूरत तोहफा दे और आप उसे यह कहो कि आपने मुझे यह क्या झंझट भरा तोहफा दे दिया, इसे आप वापस ले लो, तो क्या वह नाराज नहीं होगा? क्या यह मनुष्य - जन्म परमात्मा द्वारा दिया गया तोहफा नहीं है?
मुक्त होने की चाहत मात्र सुरक्षा खोजने की भावना है। कुछ ऐसी स्थिति मिल जाए जहां कुछ ना करना पड़े, बस एक विश्राम, परम विश्राम। यह चाहत वर्तमान के प्रति विरक्ति पैदा कर देती है, जिसका दुष्परिणाम होता है न वर्तमान सुंदर बन पाता है और न भविष्य। जिसका वर्तमान सुंदर नहीं हो उसका भविष्य सुंदर हो ही नहीं सकता। अभी यदि काम करने की जरूरत है तो वर्तमान जीवन पर। इसे इतना सुंदर बना दिया जाए कि मुक्ति की अभिलाषा ही ना रहे। जब कोई अभिलाषा बाकी ना रहे, उसे ही सच्ची मुक्ति कहते हैं।जो है उसे स्वीकार करना, उसे आनंद, उत्साहपूर्वक जीना, उससे नफरत न करना, बल्कि उसे सच्चे मन से अपनाना ही असली मुक्ति है। जो मिला है, उसे काटना पड़ेगा, यह मजबूरी है, इससे छुटकारा मिल जाए, तो बड़ा अच्छा होगा, यह सोच कैसे मुक्ति दिला सकती है। यह तो मन ही बंधन भरा हो गया है। यह मुक्त होने का रास्ता हो ही नहीं सकता।
मुक्ति कोई शारीरिक क्रिया नहीं है। मुक्ति सोच से जुड़ी है। जब तक जो मिला है उससे नफरत है, तब तक मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। जितना जीवन से भागेंगे, जितना बचाव का रास्ता खोजेंगे, उतना ही मन का जुड़ाव बढ़ता जाएगा।
एक बहुमंजिला इमारत में आग लग गई। सातवीं मंजिल पर लोग फंसे हुए थे। नीचे जाने का कोई रास्ता नहीं था। आग बढ़ती जा रही थी। उस मंजिल पर भी आग कभी भी आ सकती थी। पास की इमारत पर बचाव दल पहुंचा और वहां से उस इमारत के बीच में पुलियानुमा पाइप डाल दिए गए। उनके सहारे बचाव दल उस इमारत पर पहुंचा और लोगों से कहा कि इस पुलिया के सहारे आप जल्दी-जल्दी दूसरी इमारत पर जाकर अपने आप को बचा लो। बस ध्यान एक ही रखना है कि नीचे भूलकर भी नहीं देखना है। कोई तैयार नहीं हो पा रहा था। सबको बड़ा डर लग रहा था तो बचाव दल में से लोगों ने उस पर चल कर दिखाया, ताकि उनका डर निकल सके। एक व्यक्ति ने हिम्मत दिखाई कि मैं जाता हूं। उसको बार-बार यही हिदायत दी जा रही थी कि नीचे बिल्कुल मत देखना। बस इसी बात का तुम्हें ध्यान रखना है। वह व्यक्ति रवाना हुआ। चलना तो सहज ही था। चलना उसे कठिन नहीं लग रहा था, लेकिन नीचे देखने की इच्छा को रोकना उसके लिए सबसे मुश्किल हो रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसका मन क्यों बार-बार ऐसा हो रहा था कि नीचे एक बार देखें तो सही कि ऐसा क्या है, जिसे देखने के लिए इतना मना किया गया था। बड़ा नियंत्रित करना पड़ रहा था मन को। बड़ा लड़ना पड़ रहा था अपने आप से। उसे चलने से कोई कठिनाई नहीं हो रही थी। कठिनाई आ रही थी, तो सिर्फ मन से लड़ने में। बड़ा कठिन संघर्ष था, लेकिन जीवन और मौत का सवाल था। जैसे-तैसे वह दूसरी इमारत के किनारे पर पहुंच गया। वह बड़ा खुश हुआ कि चलो बच तो गया। जैसे ही उसने एक पांव उस इमारत पर रखा। वह अपने मन को रोक न पाया। उसने सोचा अब पहुंच तो गया ही हूं, अब तो कम से कम एक बार नीचे देख लूं। जैसे ही उसने नीचे देखा, उसके होश उड़ गए। वह एकदम लड़खड़ा कर गिरने लगा। वह तो बचाव दल वाले लोगों ने उसको पकड़ कर खींच लिया वरना तो वह गिर ही चुका था।
स्पष्ट है, जिससे जितना ज्यादा बचने का प्रयास करोगे, मन उसकी तरफ उतना ही ज्यादा आकर्षित होगा।
एक गुरुजी शहर में आए। कुछ लोगो उनसे शिक्षा लेने आए। गुरुजी ने सब को भगवान की बड़ी मूर्ति के सामने इकट्ठा किया। उस मूर्ति की बड़ी तारीफ की। फिर उनसे बोले मैं आपको एक ध्यान करवाउंगा। आपको अपनी आंखें बंद रखनी है और दो मिनट के लिए एक विशेष ध्यान करना है। दो मिनट आप और कुछ भी अपने ध्यान में लाओ, बस इस मूर्ति को अपने ध्यान में बिल्कुल मत आने देना। इससे आपको बड़ी विशेष अनुभूति होगी। इस बात का पूरा ख्याल रखना है कि इस मूर्ति पर एक बार भी आपका ध्यान नहीं जाना चाहिए। सब ने अपनी आंखें बंद कर ली। बेशक दो मिनट तक उस मूर्ति के अलावा उनका ध्यान कहीं जा ही नहीं पाया, लेकिन पूरे दो मिनट तक उस मूर्ति से ध्यान हटाने के प्रयास के अलावा वे कुछ कर ही नहीं पाए।
किसी भी स्थिति से मुक्त होने की इच्छा सबसे बड़ा बंधन है। इसीलिए जो है, उसे स्वीकार करना होगा। भागने की कोशिश करोगे, तो वह आपको और ज्यादा जकड़ लेगी।
अभी जो जीवन मिला है, इसे अच्छी तरह जीना है। हमारे लिए इतनी सोच काफी है। यदि कोई तैयारी करनी है तो इसे और बेहतर तरीके से जीने के लिए करो। इससे मुक्त होने की तैयारी मत करो, इसमें तो आप और उलझ जाओगे। आपका मन हमेशा जीवन में ही अटका रहेगा। आपका मन कभी उससे छूट नहीं पाएगा। कभी स्पष्ट मार्ग आपको दिखाई नहीं देगा। बड़ी दुविधा महसूस होगी। लेकिन आपने अपनी सोच को मात्र इस जीवन को सुंदर बनाने पर केंद्रित कर लिया, तो आपके जीवन में स्पष्टता आ जाएगी और आप अपने आप को मुक्त महसूस करेंगे।

Comments

Popular posts from this blog

निंदा - Ninda

निंदा पत्नी ने पति से कहाँ- टीवी कि आवाज जरा कम कर दो इस आवाज की वजह से पडोस मैं जो पति- पत्नी झगड रहे है वह मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। सबक दुसरो कि निंदा सुनने में बडा आंनद आता है इस लिए गुरु के हितकारी प्रवचन हम सुन नहीं सकते हैं। निंदा करना और सुनना प्रवचन सुनने के लिए बाधक भी है और उसके प्रभाव को नाश करने वाला है।

लक्ष्मण को दिया था रावण ने अंतिम संदेश Lakshman ko diya tha ravan ne antim Sandesh

रावण जब मृत्यु शैया पर थे तब राम ने लक्ष्मण से कहा कि, "तुम रावण के पास शीघ्र पहुंचों। उसके पास अमूल्य ज्ञान है, उसे अर्जित करो। उससे जगत के लिए अंतिम संदेश ले आओ।" लक्ष्मण दौड़े। उसने रावण से कहा, "राम रो रहे हैं।" रावण के द्वारा वजह पूछने पर लक्ष्मण ने बताया कि "आपके अंतकाल से व्यथित हुए हैं। मुझे आपके पास अंतिम संदेश प्राप्त करने के लिए भेजा है। बड़े भैया ने कहलवाया है कि "आप अनेक गुणों के भंडार हैं। सीता का अपहरण तो आपकी आकस्मिक (कर्मोदय जनित) भूल थी।" आंख में अश्रु सहित रावण ने कहा कि "मेरे जैसे शत्रु का भी राम गुणकथन करते हैं। इसी लिए राम जगत में भगवान के रूप में पूजे जाते हैं।" अब आपको मेरा अंतिम संदेश यह है, कि" आज की बात कल पर छोड़नी नहीं चाहिए। मेरी इच्छा थी कि मैं स्वर्गगमन के लिए धरती पर सीढी रखूं, जिससे सभी जीव स्वर्गारोहण कर सकें, कोई भी नरक की दिशा में गति न करें, पर वह कार्य अधूरा ही रह गया। मैंने इस काम में विलंब किया और मौत वेग से आगे बढ़ गई। अब अफसोस करने में क्या लाभ। Rich Dad Poor Dad - 20th Anniversa...

मन में उत्पन्न भावों का प्रभाव अत्यंत बलशाली होता है। Maan main utpann bhavo ka prabhav atyant balshali hota hai.

एक हाथी प्रतिदिन पानी पीने के लिए बाजार में से होकर नदी के किनारे पर जाया करता था। मार्ग में दर्जी की दुकान आती थी। दर्जी पशु - प्रेमी था। हाथी जब भी उधर से गुजरता तो उसे खाने के लिए कुछ ना कुछ जरूर देता। हाथी भी खुश हो जाता। वह भी जब पानी पीकर वापस आता तो उद्यान में से पुष्पों को तोड़कर दर्जी की दुकान पर डाल जाता। प्रतिदिन का यह कार्यक्रम बन गया। एक दिन दर्जी किसी कार्य अवश्य बाहर गया हुआ था। दुकान पर उसका बेटा बैठा हुआ था। हाथी प्रतिदिन के कार्यक्रम के अनुसार दर्जी की दुकान पर जाकर अपनी सूंड को लंबा किया। दर्जी पुत्र को पिता के कार्य की जानकारी ना होने से अपनी भावना के अनुसार हाथी की सूंड पर जोर से सुई लगा दी। हाथी चुपचाप वहां से चला गया। हाथी पंचेइंद्रियों प्राणी है। उसके पास मन है। दर्जी पुत्र के दुर्व्यवहार से उसका मन ग्लानि से भर गया। नदी के किनारे पानी को पीया। प्रतिदिन तो उद्यान में जाकर फूलों को तोड़ता था, आज उसने बगीचे में ना जाकर गंदे नाले के पास गया, वहां सूंड में कीचड़ भर लिया। जैसे ही दर्जी की दुकान के पास पहुंचा और कीचड़ से भरी सूंड को उसकी दुकान पर उछाला। दर्जी पुत्र भी...