Skip to main content

संसार में कौन आपका है sansar mein kaun Aapka hai

यह संसार संयोगों का खेल है। जीव परलोक में जैसा कर्म करता है, उन कर्मों के साथ लिए इस संसार में जन्म लेता है, माता के गर्भ से जब बालक का जन्म होता है, तब वह अकेला होता है बाहरी सहयोग से मुक्त रहता है। न किसी को अपना मानता है, नहीं किसी को पराया।
जन्म लेने के पश्चात माता के साथ उसका पहला मोह संबंध जुड़ता है। भूख लगने पर माता उसे दूध पिलाती है। कुछ भी दुखने पर वह उसे प्यार - दुलार से पुचकारती है। ममता का शीतल सुखद स्पर्श देकर उसका पालन-पोषण करती है।
वह शिशु केवल अपनी माता को ही पहचानता है। उसी को अपना मानने लगता है। क्रमशः बहन, भाई, पिता आदि स्वजनों के साथ उसका स्नेहबंधन जुड़ता है। फिर खिलौनों से खेलता है तो खिलौनों को अपना मानने लगता है। उन्हीं से उसे गहरा लगाव हो जाता है। धीरे-धीरे मोह का, ममता का विस्तार होता जाता है। मित्र, परिवार फिर धन और फिर विवाह होने पर पत्नी संतान होने पर उन सब के साथ उसका प्रेम या मोह का सूत्र गहरा जुड़ता जाता है।
एक दिन अकेला जन्म लेने वाला बालक बड़ा होकर ममता का बड़ा संसार अपनी चारों तरफ बसा लेता है। सब को अपना मानने लगता है। सब कोई उसे अपना पुत्र, भाई, मित्र, पति आदि मोह संबंधों की साकलों से बांध लेते हैं। ममता और आसक्ति के बंधन में ऐसा जकड़ जाता है, जैसे कोई भोला - भाला हरिण किसी शिकारी के बंधनों में बंधकर पराधीन होकर तड़पता फड़फड़ा है।
मकड़ी जैसे अपने बुने जाल में फंसती जाती है, ऐसी या इससे भी विषम स्थिति ममता के बंधन में बंधी आत्मा की हो जाती है। वह दूसरों के दु:ख से दु:खी होती है। दूसरों के लिए अपना आनंद और सुख सब कुछ लूटाता रहता है।
एक दिन जब मौत आती है, तो घर, परिवार, धन, पुत्र, पत्नी, माता-पिता सबको यही वह रोता बिलखता छोड़कर अकेला परलोक को चला जाता है। कोई भी उसके साथ नहीं जाता है। जाता है केवल अपना किया हुआ सत्कर्म या दुष्कर्म। पुण्य या पाप।
यह संसार कितना विचित्र है। जैसे हजारों की भीड़ में खड़ा अनजान व्यक्ति भी अपने को अकेला समझता है, उसी प्रकार अनेक रिश्तेदारों, मित्रों आदि के संयोग में भी जीव आत्मा सुख - दु:ख भोगने में अकेला ही है। यहां कोई किसी का सुख दु:ख बांट नहीं सकता। यही तो जीव का एकाकीपन है। इस दु:ख, वेदना, वियोग आदि विपत्तियों से धीरे संसार में जिसने ममता की बेडियां तोड़ डाली, जिसने अपनी अकेली आत्मा का स्वरूप समझ लिया और यह जान लिया कि यह आत्मा मोह,ममत्व कषाय आदि भीतर संयोग और माता-पिता, पत्नी, पुत्र आदि बाह्य संयोगों के कारण ही निरंतर दु:ख पाता रहा है। वेदना भोगता रहा है और जन्म - मरण के चक्र में भटकता रहा है।
जैसे दूसरे के धन को, दूसरे की पत्नी को यदि कोई अपना मान लेता है तो वह मूर्ख या अपराधी समझा जाता है। वैसे ही आत्मा मोह आदि के कारण पर - वस्तु को, अपना मान कर जन्म - जन्म से दु:ख भोगता रहा है।
जिसने इनसे संयोगों की बेडियां तोडकर अपने आत्म स्वरूप को समझ लिया वह मोह रहित साधक संसार में सदा सुख - शांति का अनुभव करता है। जन्म, रोग, बुढ़ापा, वियोग, राग, द्वेष आदि की भयानक आग में जलते इस संसार में सबसे पहले अपनी आत्मा को बचाने की चेष्टा करो, क्योंकि यह आत्मा ही सुख का, आनंद का रसकन्द है। यही सुख - शांति और अमरता देने वाला है।
इस प्रकार बाह्य संयोगों के संसार में अपनी अकेली ज्ञानमय, आनंदमय आत्मा को देखने का प्रयास करना, यही एकत्व भावना है।

Comments

Popular posts from this blog

निंदा - Ninda

निंदा पत्नी ने पति से कहाँ- टीवी कि आवाज जरा कम कर दो इस आवाज की वजह से पडोस मैं जो पति- पत्नी झगड रहे है वह मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। सबक दुसरो कि निंदा सुनने में बडा आंनद आता है इस लिए गुरु के हितकारी प्रवचन हम सुन नहीं सकते हैं। निंदा करना और सुनना प्रवचन सुनने के लिए बाधक भी है और उसके प्रभाव को नाश करने वाला है।

जिनके साथ हम रहेंगे वैसे ही बन जाएंगे। Jinke sath ham rahenge vaise hi ban jaenge

प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...

बड़प्पन उम्र से नहीं अच्छे कर्मों से सिद्ध होता है badappan umra se nahin acche karmon se siddh hota hai

बड़ा तो गधा भी हो जाता है और कुत्ता भी हो जाता है, गुंडा भी हो जाता है और दुर्जन भी हो जाता है, चोर भी हो जाता है और व्यभिचारी भी हो जाता है। मात्र समय व्यतीत होता है और यह सभी बड़े हो जाते हैं। परंतु, यह " बड़प्पन " न तो गौरवप्रद बनता है और न ही किसी के लिए आलंबन रूप बनता है। परंतु…… एक बड़प्पन ऐसा है कि जिसका संबंध समय के साथ नहीं, पर सत्कार्यों के साथ है। उम्र के साथ नहीं, पर विवेक के साथ है। यह बड़प्पन गौरवप्रद भी बनता है और अनेकों के लिए आलंबन रूप भी बनता है। एक सनातन सत्य हमें आंखों के सामने रखना है और वह यह है कि   जिंदगी की लंबाई बढ़ाने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते लेकिन हमारे हाथ में यह दो चीजें हैं - जिंदगी की चौड़ाई हम बढ़ा सकते हैं, जिंदगी की गहराई हम बढ़ा सकते हैं। जीवन को यदि हम सत्कार्यों से महका रहे हैं तो हमारे जीवन की चौड़ाई बढ़ रही है और उन सत्कार्यों के फल - स्वरुप यदि हमारे मन की प्रसन्नता बनी रहती है तो हमारे जीवन की गहराई बढ़ रही है। पर कैसी दयनीय दशा है हमारी ? जीवन की इस जिस लंबाई को बढ़ाने में स्वयं परमात्मा को भी सफलता नहीं मिली उस लंबाई को बढ़ाने ...