Skip to main content

दान - लक्ष्मी की शान ! Dan - Lakshmi ki shan.

लक्ष्मी का सच्चा उपयोग दान है। भोग अथवा नाश संपत्ति का अच्छा बुरा परिणाम है,ऐसा करने की अपेक्षा यों कहना चाहिए कि भोग पुण्यधीन संपत्ति का विवेकाहीन दुरुपयोग है जबकि नाश लक्ष्मी को अपने समझने वाले व्यक्ति की निर्बलता को चुनौती और उसके पुरुषत्व की स्पष्ट अवहेलना करना है।
पुण्य के क्षीण होने पर संपत्ति स्वयंमेव चली जाती है या आयु पूर्ण होने पर लक्ष्मी का भोक्ता स्वयं चला जाता है - जो दोनों रीती से लक्ष्मी का नाश कहा जाता है।
वस्तुत: ऐसा ना सुने स्वामी को गौरव, स्वमान या प्रतिष्ठा प्रदान करने वाला परिणाम नहीं परंतु लक्ष्मी के भोक्ता की यह एक विडंबना है।
भोग या नाश - यह लक्ष्मी का वास्तविक दृष्टि से सच्चा फल नहीं है। त्याग अथवा सुपात्र में लक्ष्मी का दान तथा दया पात्र का उद्धार - यही लक्ष्मी का स्वपर उपकारक फल है। इसके लिए मतिसागर मंत्री के पुत्र सुमति का प्रसंग आता है जो विवेकी आत्मा के सुंदर कोटी की विचारणा का प्रतिबिंब है।
सुमति विवेक संपन्न है।पूर्व की आराधना के कारण बाल्यकाल में शुभ - अशुभ के विवेक शक्ति उसमें विद्यमान है। दासी पुत्र होने से मंत्री उसे पढ़ाने के लिए गुप्त भोंयरे में रखता है। वेद आदि का अध्ययन अध्यापन मंत्री के घर में चालू है। अन्य ब्राह्मण पुत्र छात्र के रूप में मंत्री के पास अध्ययन कर रहे हैं। सुमति भोंयरे में रहकर यह सब सुनता है। पाठ के समय शंका होने पर उसके विषय में सूचना करने हेतु मंत्री ने सुमति को एक डोरी दे रखी है जिसका एक छोर सुमति के हाथ में रहता था और दूसरा मंत्री के आसन पर। मंत्री जो कुछ पढ़ाता था, उसमें शंका होने पर सुमति उस डोरी को हिलाता था, मंत्री पाठ के समय अवसर देखकर उसका निवारण कर देता था।
दान, भोग तथा नाश - यह तीन लक्ष्मी की परिणाम है, जो दान देता है, न भोगता है, उसका तीसरा परिणाम नाश होता है।
मंत्री मतीसागर उक्त रीति से श्लोक का अर्थ समझा रहे हैं परंतु विवेकशील सुमति को अर्थ ठीक नहीं लगा। वह शंकाशील बनकर इसके निवारण हेतु बार-बार डोरी हिलाता है। मंत्री एक बार, दो बार उस श्लोक का अर्थ स्पष्ट करते हैं। परंतु सुमति के मन का समाधान नहीं होता। मंत्री को रोष आता है। ऐसे सीधे से अर्थ में सुमति जैसे बुद्धिमान की बुद्धि को अटकते देखकर मंत्री का धैर्य समाप्त हो गया। उसने पाठ बंद कर दिया और छात्रों को छुट्टी दे दी।
सुमति को ऊपर बुलाकर मतिसागर मंत्री ने पूछा - क्यों, ऐसे सीधे से श्लोक में तेरी बुद्धि कुंठित हो गई ? इसमें क्या समझ नहीं पड़ रहा है ? सो बता।
सुमति ने धीरज के साथ नम्रतापूर्वक कहा - पिताजी ! लक्ष्मी के तीन फल आपने कहे हैं, वह समझ में नहीं आता।
क्योंकि -
सैकड़ों प्रयत्नों से, पुण्य के योग से प्राप्त होने वाले तथा प्राणों से भी महत्वपूर्ण धन का एकमात्र फल दान ही हो सकता है, अन्य तो सब विपत्तियां ही है। मतिसागर स्वयं प्रज्ञाशील है, विवेकी है तथा वस्तु के मर्म को सहज में समझने वाला है अतः सुमति के कथन को सुनकर वह सारी परिस्थिति को समझ गया। उसने पुत्र के विवेक की प्रशंसा की।
सचमुच सकल दोषों को ढांकने वाला विवेक नवनिधि की अपेक्षा भी विशेष सर्व संपत्ति का आदि कारण है तथा यह अलौकिक दशम निधि है। लक्ष्मी की सच्ची शोभा दान है, यह विवेक के द्वारा ही समझा जा सकता है।

लक्ष्मीजी ने स्वयंम अपने मुख से यह कहां है कि मेरा उपयोग करो,मेरा दान करो अन्यथा में स्वंत: ही नष्ट हो जाऊंगी।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

निंदा - Ninda

निंदा पत्नी ने पति से कहाँ- टीवी कि आवाज जरा कम कर दो इस आवाज की वजह से पडोस मैं जो पति- पत्नी झगड रहे है वह मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। सबक दुसरो कि निंदा सुनने में बडा आंनद आता है इस लिए गुरु के हितकारी प्रवचन हम सुन नहीं सकते हैं। निंदा करना और सुनना प्रवचन सुनने के लिए बाधक भी है और उसके प्रभाव को नाश करने वाला है।

अनाथ anath

श्रमण अनाथी , नगर के बाहर उपवन में थे युवा अवस्था , भरपूर चैतन्य शक्ति और ऊर्जा का आध्यात्मिक प्रयोग वर्षों की साधना को घंटों में पूर्ण कर रहे थे। एक दिन उपवन में सम्राट श्रेणिक पहुंचे । मुनि के दमकते हुए चेहरे और उभरते हुए यौवन से श्रेणिक विस्मय -विमुग्ध हो उठे। सोचने लगे ,यह सौंदर्य भोग के लिए है या योग के लिए है ? सन्यासी होने का अर्थ यह तो नहीं है कि जीवन के साथ ही अन्याय किया जाए। श्रेणिक मुनि के पास पहुंचे । पूछा ' इस तरह यौवन अवस्था में गृह - त्याग कर सन्यास अपनाने की सार्थकता क्या है ? मुनि ! यह यौवन , भोगों को भोगने के लिए है । तुम उसे क्षीण कर रहे हो । ' मुनि ने कहा , ' नहीं ! मैं ऊर्जा का सदुपयोग कर रहा हूं । वह व्यक्ति भला साधनाओं की पराकाष्ठाओं को कैसे छू पायेगा जो अपना यौवन संसार को सौंपता है और बुढ़ापा परमात्मा को। राजन ! जितनी उर्जा भोग के लिए चाहिए , उससे सौ -गुनी ऊर्जा योग के लिए भी आवश्यक है । ' सम्राट सकपका गया । पूछने लगा ' मुनिवर ! क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं । ' मुनि ने कहा , ' अनाथी । ' ' अनाथी ! बड़ा विचित्र नाम है। मु...

लक्ष्मण को दिया था रावण ने अंतिम संदेश Lakshman ko diya tha ravan ne antim Sandesh

रावण जब मृत्यु शैया पर थे तब राम ने लक्ष्मण से कहा कि, "तुम रावण के पास शीघ्र पहुंचों। उसके पास अमूल्य ज्ञान है, उसे अर्जित करो। उससे जगत के लिए अंतिम संदेश ले आओ।" लक्ष्मण दौड़े। उसने रावण से कहा, "राम रो रहे हैं।" रावण के द्वारा वजह पूछने पर लक्ष्मण ने बताया कि "आपके अंतकाल से व्यथित हुए हैं। मुझे आपके पास अंतिम संदेश प्राप्त करने के लिए भेजा है। बड़े भैया ने कहलवाया है कि "आप अनेक गुणों के भंडार हैं। सीता का अपहरण तो आपकी आकस्मिक (कर्मोदय जनित) भूल थी।" आंख में अश्रु सहित रावण ने कहा कि "मेरे जैसे शत्रु का भी राम गुणकथन करते हैं। इसी लिए राम जगत में भगवान के रूप में पूजे जाते हैं।" अब आपको मेरा अंतिम संदेश यह है, कि" आज की बात कल पर छोड़नी नहीं चाहिए। मेरी इच्छा थी कि मैं स्वर्गगमन के लिए धरती पर सीढी रखूं, जिससे सभी जीव स्वर्गारोहण कर सकें, कोई भी नरक की दिशा में गति न करें, पर वह कार्य अधूरा ही रह गया। मैंने इस काम में विलंब किया और मौत वेग से आगे बढ़ गई। अब अफसोस करने में क्या लाभ। Rich Dad Poor Dad - 20th Anniversa...