लालच आदमी का सबसे ज्यादा अहित करने वाला शत्रु है। Lalach aadami ka sabse jyada ahit karne wala shatru hai.
जब जीवन रूपी सागर का मंथन चिंतन रूपी मथनी से किया जाता है तब अनुभव रूपी अमृत प्राप्त होता है। जब पापवृत्ति पैदा होती है तो वह लोभ को जन्म देती है। लोभ अनेक अनिष्टों को जन्म देता है। भाई - भाई के बीच झगड़े का कारण, स्नेही जनों में क्लेश कराने वाला, देशों देशों में युध्द कराने वाला लोभ ही है। लोभी व्यक्ति संपत्ति का न तो स्वंय उपयोग करता है नहीं किसी को करने देता है।
एक सेठ जी थे। वह जितने धनवान थे, उतने कंजूस भी थे। चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए । उसके पास एक बहुत बड़ी तिजोरी थी, जिसमें एक मनुष्य सो सके। उस तिजोरी में एक ऑटोमेटिक मशीन थी। जरा सी तिजोरी बंद हुई कि स्वयं भी उसी में बंद हो जाए, फिर चाबी बिना वह खुलती नहीं थी।
एक दिन सेठ जी तिजोरी में बैठकर अपनी संपत्ति, सोना, चांदी आदि लक्ष्मी को गिन रहे थे। नोटों के बंडल के बंडल गिन - गिन कर वह अपने पास रख रहे थे। इतने में दुकान का नौकर आया। कहीं वह देख ना ले इसी शंका से सेठ जी अपनी तिजोरी बंद करने लगे। योगानुयोग वह सारी बंद हो गई। सेठ जी भी अंदर बंद हो गए। नौकर तो कमरे में काम करके चला गया था। सेठ ने बहुत जोर लगाकर तिजोरी खोलने की कोशिश की परंतु बिना चाबी के वह नहीं खुली। बिना हवा के सेठ जी के उसी तिजोरी में प्राण पखेरू उड़ गये।
घर में सभी सेठ जी की प्रतीक्षा कर रहे थे, परंतु सेठ जी घर नहीं पहुंचे। पूरे शहर में, गली बाजारों में, मित्रों के घरों में, स्नेह संबंधियों के घरों में खोज करने पर भी सेठ जी का पता ना चला। तब नौकर ने डरते - डरते कहा कि मैंने एक बार सेठ जी को तिजोरी में रुपए गिनते देखा था।
परिवार वालों ने सोचा कि कहीं तिजोरी में बंद ना हो गए हो। जाकर देखा तो अंदर से दुर्गंध आ रही थी। लुहार को बुलाकर ताला तुड़वाया। देखा कि सेठ जी के हाथों में रुपए के बंडल थे। सोने चांदी का ढेर पास पड़ा था। सभी को समझते देर नहीं लगी।
बच्चों ने सेठ जी को निकाला दाह संस्कार किया। सेठ जी की हालत को देखकर सभी को शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि सेठजी दुनिया से चले गए पर कुछ भी साथ नहीं ले कर गए। सब कुछ धरती पर पड़ा रह गया।
इसीलिए ज्ञानी कहते हैं कि संपत्ति का सदुपयोग अपने हाथों से कर लीजिए। यह लोभ आत्मा का सबसे अधिक अहित करने वाला शत्रु है। लोभ को पाप का बाप कहा जाता है। अतः लोभ से सदा बचके रहना चाहिए। और संतोष वृत्ति को जीवन का अंग बनाना चाहिए जिससे इस लोक में भी सुख शांति की प्राप्ति होती है और परभव में भी सद्गति की प्राप्ति होती है।
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