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नर से नारायण और भगत से भगवान बना जा सकता है। Nar se Narayan aur aur bhagat se bhagwan banaa ja sakta hai.

एक बार एक शिष्य ने गुरु से पूछा गुरुदेव परमात्मा हमें दिखाई क्यों नहीं देता है?

गुरु गुरु ने शिष्य से कहा मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूं पर इसे तू कहानी समझ कर ही सुनना इसका यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है।

बात तब की है जब परमात्मा जगत की सृष्टि कर रहे थे। त्रिदेव की आज्ञा पर भगवान ने सभी जीव जंतु की रचना की और अंत में उसने अपने सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य को रचा।

जब मनुष्य पूर्ण रूप से तैयार हो गया तो भगवान ने उसे भी पृथ्वी पर दूसरे जीव जंतुओं के समान भेज दिया।

भगवान आश्वस्त होकर आराम करने चले गए।

कुछ ही देर बाद मानव फिर से भगवान के सन्मुख खड़ा था। भगवान ने पूछा क्या है मानव आप वापस क्यों लौट आए।

मानव ने कहा प्रभु आपने इस जगत में बुद्धि और सोचने समझने की शक्ति सिर्फ मुझे दी है। यह आपका परम उपकार है मानव जाति पर मगर भगवान मैंने सोचा कि मैं दूसरे जीव जंतु के समान निर्वस्त्र तो इस जगत में नहीं ना विचरण कर सकता हूं। तो आप से विनंती है कि आप मुझे वस्त्र प्रदान करें।

भगवान ने तुरंत ही मानव को वस्त्र का दान कर दिया और मानव वस्त्र लेकर पृथ्वी पर आ गया।

भगवान फिर आराम करने चले तो देखा कि मानव फिर से वापस आ गया है।

भगवान ने फिर मानव से पूछा कि क्या हुआ है।

तब मानव ने कहा मैंने फिर एक बार सोचा कि मैं जीव जंतु के समान जंगल में नहीं ना विचरण कर सकता हूं तो आप मुझे एक घर रहने के लिए प्रदान करें ।

भगवान ने उसे एक घर भी उपलब्ध करा दिया और उसे वापस पृथ्वी पर भेज दिया।

कुछ समय के उपरांत मानव फिर से भगवान के समक्ष खड़ा था।

अब भगवान ने विचलित होते हुए पूछा कि अब क्या है।

भगवान मैंने एक बार फिर सोचा कि मैं जीव-जंतुओं के समान जंगल में नहीं ना भोजन के लिए भटक सकता हूं तो आप कृपया करके मेरे लिए भोजन का प्रबंध करें।

भगवान को क्रोध तो बहुत आया और उन्होंने मानव को भोजन दे दिया और मानव से भी पहले भगवान स्वयं अंतर्ध्यान हो गए।

अब भगवान ने सोचा कि जो मानव पृथ्वी पर जाकर तीन-तीन बार वापस लौट कर आया है वह चौथी बार भी अपनी इच्छा को पूरी कराने के लिए मेरे पास आएगा।

भगवान पलायन करते हुए महादेव के पास कैलाश पर्वत पहुंच गए। उन्होंने महादेव से मानव की इच्छा पूर्ति की बातें बताई और उन्हें वहां छुपाने का आग्रह किया।

तब महादेव ने भगवान से कहा कि आप यहां नहीं छुप सकते हो क्योंकि रोज कोई न कोई मानव भगवान की खोज हिमालय पर चला आता है ।

तो आप छुपने के लिए समुद्र में विष्णु भगवान के पास जाइए।

महादेव की बातें सुनकर भगवान सागर में विष्णु भगवान के पास पहुंचे और उन्हें छुपाने का आग्रह किया।

तब विष्णु भगवान ने कहा कि सागर में भी नहीं छुप सकते हो क्योंकि रोज कोई न कोई मानव गोता लगाकर यहां पर खोजने आते हैं कि कहीं भगवान यहां तो नहीं है।

अब भगवान आकाश मार्ग से विचलित होते हुए भ्रमण कर रहे थे कि उन्हें नारद दिखाई पड़े नारद ने भगवान को प्रणाम किया और उनकी कुशलता पूछी।

भगवान ने सारी व्यथा नारद जी को बताई। इस पर नारद जी ने भगवान से कहा कि आप को मानव से छूपने की जगह मैं बता सकता हूं।इस पर भगवान बहुत ही प्रसन्न हो गए और उन्होंने पूछा कि बताओ नारद वह कौन सी जगह है।

नारद जी ने कहा प्रभु आप स्वयं मानव के अंदर छुप जाइए क्योंकि मानव सारे जगत में आपको खोजेगा पर अपने अंदर कभी भी नहीं खोजेगा ।

तब से भगवान स्वयं मानव के अंदर छुप गए हैं और हम मानव भगवान को मंदिर मस्जिद गिरजाघरो में तलाश कर रहे हैं।

नर से नारायण होता है वैसे ही आत्मा सो परमात्मा होता है।

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