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देह से आत्मा और आत्मा से परमात्मा deha se aatma aur aatma se parmatma

हाथी कितना बड़ा होता है और महावत हाथी से बहुत छोटा होता है, महावत से छोटा अंकुश होता है, उस से छोटी महावत की हथेली होती है और हथेली से छोटी उसकी उंगलियां होती है। जिससे वह अंकुश को चलाता है और अंगुली से भी छोटा होता है मन जो अंगुली को चलाता है और हाथी को नियंत्रित किया जाता है। पर क्या आपने सोचा है मन से भी कोई छोटी चीज महावत के शरीर में है जी हां वह है उसकी आत्मा जो मन से भी ज्यादा सूक्ष्म है, अदृश्य और अगोचर है। मन तो फिर भी व्यक्ति की गतिविधियों से अनुभव किया जा सकता है परंतु आत्मा का अनुभव करने के लिए तो अंतर्दृष्टि की आवश्यकता होती है। यद्यपि मन से ही प्राणियों के सारे क्रियाकलाप होते हैं और मन से ही सारा संसार चलता है,पर मन के पीछे जो आत्मा की छिपी हुई शक्ति है उसे हम भौतिकता की अंधी दौड़ में कभी पहचान नहीं पाते हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि आत्मा होती है, यदि होती है तो उसका आकार प्रकार क्या है ? उसको किसने देखा है ? तो मेरा जवाब है, कि क्या किसी ने मन को देखा है ? क्या किसी ने हवा को देखा है ? क्या आपने अहंकार को देखा है ? नहीं फिर भी यह है कि नहीं ? इसी तरह आत्मा भी दिखाई नहीं देती है किंतु उसके रहते ही प्राणी का शरीर सक्रिय रहता है और उसके विदा होते ही शरीर निष्क्रिय माटी का पुतला हो जाता है इससे प्रमाणित है कि आत्मा है।
आत्मा सर्वशक्तिमान है किंतु हम केवल नाशवान भौतिक वस्तुओं से आकर्षित और मोहित होकर अपने जीवन को उन्हीं के पीछे पागल बनकर के नष्ट कर रहे हैं। जबकि आत्मा का ध्येय संसार जो दुख का सागर है वह नहीं होकर परमात्मा जो सुख का सागर है वह है।
हम अपने जीवन को धन-संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा, बल, सत्ता और सुख-सुविधाओं की भौतिक वस्तुओं का अंबार लगाने में व्यर्थ खो देते हैं। जबकि यह सभी चीजें क्षणिक सुख देनेवाली और नाशवान है, केवल आत्मतत्व और परमात्वतत्व ही सत्य और शाश्वत है।
संसार का बड़ा से बड़ा आकार प्रकार या वस्तु भी सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्ति संपन्न के सामने शूद्र साबित होता है ,जैसे हाथी अंकुश के सामने और यह शरीर अगोचर सूक्ष्म आत्मा के सामने।
जैसे एक पहाड़ में कई चट्टानें, पत्थर, मिट्टी आदि हैं इनकी विशालता और ताकत के सामने एक अणु और परमाणु की ताकत नगण्य नजर आती है किंतु हम जानते हैं कि एक परमाणु विस्फोट एक पहाड़ को धाराशाही करने में सक्षम होता है, इसीलिए परमाणु की ताकत पहाड़ से ज्यादा साबित हुई है।
इसी तरह परमाणु से भी अति सूक्ष्म जो मन है और मन से भी अति सूक्ष्म जो आत्मा है उसकी शक्ति तो अनंतानंद और असीम है ऐसा शास्त्रों में उल्लेख है जो सही है।
अत: हमें हमेशा स्थूल भौतिकता के आकर्षक के आगोश से मुक्त होकर सर्वशक्तिमान आत्मा का चिंतन कर परमात्मा को पाने का प्रयास करते रहना चाहिए ताकि हमारा मानव जीवन सार्थक हो सके अन्यथा चौरासी लाख योनियों की भव भ्रमणा में भटकना तो निश्चित है, इसीलिए जागो।

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