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दु:ख जितना नहीं मारता, उतना ही संसार का सुख मारने वाला है। Dukh jitna nahin, maarta utna hi sansar ka sukh marne wala hai

यह हम सभी जानते हैं कि मानव जीवन बड़ा दुर्लभ है। इसीलिए प्रभु महावीर ने कहा है - 'दुल्लहे खलु माणुसे भले।' अनन्त पुण्यवानी का संचय करने के बाद मनुष्य - भव मिला है और आगे के लिए पुण्यवानी बांधने के लिए मिला है अतः हम उसे यूं ही खत्म न कर दें। हम उस मार्ग पर चलने का लक्ष्य लेकर चलें जो मोक्ष की और जाता है।मोक्ष अर्थात मुक्ति, सभी प्रकार के दु:खों से सर्वथा मुक्ति।
संसार में रहते हुए हमें आसक्ति को घटाना है क्योंकि यही सभी प्रकार के दु:खों का मूल है। इसके बाद संयम के राजमार्ग पर चलना है। संयम का जन्म आंतरिक मन से होता है। संसार छोड़ने जैसा है, मुझे अरिहंत बनना है, यह भावना रहनी चाहिए ।मोक्ष ही मेरा घर है। जिस नगर में, जिस गांव में, जिस मकान में या जिस परिवार के साथ में रहता हूं, वह घर - परिवार तो बस रैन बसेरा है, मुझे तो शाश्वत घर में जाना है। सराय में रुकने के समान मैं यहां टिका हुआ हूं, ज्योंही समय सीमा समाप्त होगी मुझे यहां से प्रस्थान करना है -
हे संसार सराय,
जहां पथिक आय जुट जाते हैं।
लेकर टुक विश्राम,
राहों में अपनी अपनी जाते ।।
सबके स्वभाव अलग-अलग होते हैं। वो माने तो ठीक। अपनी बात कोई न माने तो संतोष कर लें। सबके साथ मैत्री भाव बढ़ाते रहना है, कषायों को छीण - छीणतर करते जाना है, मात्र दृष्टाभाव रखते हुए इस संसार को देखना है, तभी आसक्ति कम होगी एवं सुख की अनुभूति होगी। कोई बुलाये या न बुलाये, मुझे तो अंदर से आती हुई परमात्मा की आवाज को सुनना है।
संसार को सुख मारने वाला है। संसार से न्याय वह प्रेम की आशा मत करो। संसार चिंतन योग्य भी नहीं है। जितना - जितना संसार के बारे में सोचोगे, उतनी उतनी सांसारासक्ति बढ़ती जायेगी और उसमें उलझते ही जाओगे। संयम का सुख ही तिराने वाला है। अनुकूल - प्रतिकूल परिषहों में भी मुक्ति के लिए साधना करनी है। मुझमें भी अरिहंत के समान अनंत शक्ति है, मात्र उस पर आए आवरण को दूर हटाना है।
दु:ख जितना नहीं मारता, उससे भी कहीं ज्यादा सुख की आसक्ति मारती है। हम सोचें कि मेरी कोई इच्छा नहीं। दु:ख सहन करने की अपार शक्ति मेरे पास है इन कष्टों को सहने से दस गुना सहनशीलता बढ़ेगी।
जिसको संसार अच्छा लगता है वह मिथ्या दृष्टि जीव है, जिसे संसार बुरा लगता है असार प्रतीत होता है, वह सम्यग्दृष्टि है। मुझे भी सम्यग्दृष्टि बनकर इस नश्वर संसार के प्रति आसक्ति कम कर दु:खों की परंपरा को तोड़ना है।
पुण्यवानी जब बढ़ेगी तो अनुकूल निमित्त भी छप्पर फाड़कर मिलेंगे, इन अशुचि पदार्थों को देखकर सोचो कि इनमें सुख जैसा कुछ भी नहीं है। संसार में कामवासना अग्नि के समान है जिसमें पदार्थ - भोग रूपी घी जितना डालोगे, उतनी ही यह अग्नि प्रदीप्त होगी। वासना, इच्छा कभी तृप्त होती नहीं - यानी हमारी तृष्णा कभी मिटती नहीं, इसीलिए दु:ख भी मिटते नहीं। आदमी मिट जाता है, कामना कभी मिटती नहीं। इसीलिए विवेकीजन अपने शरीर को नहीं मानते। वे शरीर और आत्मा को भिन्न - भिन्न देखते हैं। वे सोचते हैं कि मेरी आत्मा अवेदी है, निर्विकारी है, सिर्फ धर्माराधना करने के लिए यह जीवन मिला है, यही भेद - विज्ञान सुख देने वाला है। इस भेद - विज्ञान को प्राप्त करने का लक्ष्य होना चाहिए।

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