बरगद के पेड़ के नीचे एक भिखारी बैठा था। बाहर से भिखारी पर उसके भीतर अमीरात तो अद्भुत थी।
उसकी गोद में एक बहुपृष्ठिय पुस्तिका पड़ी थी। उस पुस्तक के लगभग चार सौ पन्ने थे। एकदम चुप्पी साधे हुए और गंभीरतापूर्वक बार-बार वह पढ़ने को पलटता था।
पर एकाएक वह हंस देता था, खूब तालियां बजाने लगता था।
पुनः पन्ने पलटने लगता था और ऐसा ही मौन और मुख पर गंभीरता ओढ़ लेता था।
जिन्होंने भारतीय जनमानस में "हरि बोल" मंत्र की धून का चारों और प्रचार प्रसार करके लोगों को प्रभु भक्त बनाया, धून के समय जिनकी आंखों से भक्ति भाव के आंसू बरसते हो, ऐसे चैतन्य महाप्रभु उस बरगद के पेड़ के पास से होकर जा रहे थे।
उस भिखारी की विचित्र दशा को देखकर वे कुछ समय के लिए वहां रुक गए। बार-बार उसकी हास्यमयी स्थिति को देखकर महाप्रभु को आश्चर्य अनुभव हुआ।
मन में जिज्ञासा जगने पर उससे प्रश्न किया कि, "भाई ! तुम ऐसा क्यों कर रहे हो ? तुम एकाएक ही बहुत जोर से क्यों हंसने लगते हो ?
भिखारी ने अपनी पुस्तक महाप्रभु को दी। उसमें उन्होंने देखा कि मात्र 299 नंबर के पृष्ठ पर बड़े अक्षरों में "राम" लिखा था। शेष पृष्ठ सारे कोरे थे।
महाप्रभु समझ गए कि "राम" नाम वाला पृष्ठ पढ़कर वह अतिहर्षित हो जाता था।
उन्होंने भिखारी से पूछा कि "अरे ! शेष सारे पृष्ठ क्यों कोरे हैं ?"
जवाब मिला, "मुझे तो उस पृष्ठ पर "राम" मिल गए। मैं उसीसे तृप्त हो गया हूं। अन्य पृष्ठों की मुझे कोई चिंता नहीं है।
बड़प्पन उम्र से नहीं अच्छे कर्मों से सिद्ध होता है badappan umra se nahin acche karmon se siddh hota hai
बड़ा तो गधा भी हो जाता है और कुत्ता भी हो जाता है, गुंडा भी हो जाता है और दुर्जन भी हो जाता है, चोर भी हो जाता है और व्यभिचारी भी हो जाता है। मात्र समय व्यतीत होता है और यह सभी बड़े हो जाते हैं। परंतु, यह " बड़प्पन " न तो गौरवप्रद बनता है और न ही किसी के लिए आलंबन रूप बनता है। परंतु…… एक बड़प्पन ऐसा है कि जिसका संबंध समय के साथ नहीं, पर सत्कार्यों के साथ है। उम्र के साथ नहीं, पर विवेक के साथ है। यह बड़प्पन गौरवप्रद भी बनता है और अनेकों के लिए आलंबन रूप भी बनता है। एक सनातन सत्य हमें आंखों के सामने रखना है और वह यह है कि जिंदगी की लंबाई बढ़ाने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते लेकिन हमारे हाथ में यह दो चीजें हैं - जिंदगी की चौड़ाई हम बढ़ा सकते हैं, जिंदगी की गहराई हम बढ़ा सकते हैं। जीवन को यदि हम सत्कार्यों से महका रहे हैं तो हमारे जीवन की चौड़ाई बढ़ रही है और उन सत्कार्यों के फल - स्वरुप यदि हमारे मन की प्रसन्नता बनी रहती है तो हमारे जीवन की गहराई बढ़ रही है। पर कैसी दयनीय दशा है हमारी ? जीवन की इस जिस लंबाई को बढ़ाने में स्वयं परमात्मा को भी सफलता नहीं मिली उस लंबाई को बढ़ाने ...
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