वनवास समय के दरमियान एक बार मनोरम्य प्रदेश को देखकर रामचंद्र जी ने अपने अनन्य भक्त शिष्य को आदेश दिया कि, हनुमान ! यह मनोरम्य स्थल है। यहां हमें कुछ दिन के लिए रुकना है, तो तुम्हारा मन जो जगह पसंद करें वहां तुम पर्णकुटीर तैयार कर दो।" राम की बात सुनते ही हनुमान किसी सोच में पड़ गए। वहां से हटकर थोड़ी दूर जाकर किसी वृक्ष के नीचे बैठकर रोने लगे। तीन चार घंटे बाद भी हनुमान के वापस न लौटने पर लक्ष्मण और बाद में सीता जी उनकी खोज में निकली। दोनों को हनुमान मिल गए। उन्हें सिसक - सिसककर रोते हुए देख कर सीता ने पूछा, "अरे ! इतना ज्यादा रोने की कोई वजह ? क्या तुम्हारे स्वामी ने तुम्हें कोई उलाहना दी है ? हनुमान ! जो कुछ हुआ हो, वह हमें बताओ। हम उसका कोई समाधान ला देंगे।"
हनुमान जी ने स्वस्थता धारणकर कहा - "भगवान ने मुझे आज्ञा दी है कि तुम्हारा मन जहां पसंद आए ऐसे स्थान पर पर्णकुटीर बनाओ। इस आज्ञा का पालन करना मुझसे किसी हाल में संभव नहीं है। अतः मैं भारी उलझन में फंस गया हूं। हाय ! अब मैं आज्ञा द्रोही गिना जाऊंगा। माताजी ! मेरा सवाल यह है कि मुझे तो मन जैसा कुछ है ही नहीं। भगवान के मिल जाने के बाद मैंने तो अपने मन को उन में विलीन कर दिया है। अब जब मेरा मन ही नहीं है तो इस आज्ञा का पालन किस प्रकार किया जाए ?
सीता और लक्ष्मण हनुमान जी की इस स्वामी भक्ति को देखकर अति हर्षित हो गए। वह हनुमान जी को रामचंद्र जी के पास ले गए। सारी हकीकत जानकर रामचंद्र जी भी अत्यंत हर्षित हुए। बाद में अपनी मनपसंद जगह दिखाकर वहां पर्णकुटीर की रचना करने की हनुमान को आज्ञा दी।
प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...
उत्कृष्ट, अति उत्तम। हार्दिक शुभकामनाएँ सादर।
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