भोजन जब नहीं पचता है, तब अजीर्ण होता है और उस अजीर्ण में से अनेक प्रकार के रोग पैदा होते हैं।
बस, इसी प्रकार जब व्यक्ति प्राप्त ज्ञान को नहीं पचा पाता है, तब जीवन में अभिमान ही पैदा होता है।
तब का अजीर्ण क्रोध है तो ज्ञान का अजीर्ण अहंकार है।
पूर्व जन्म में की गई ज्ञान की आराधना के फल स्वरूप ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से बुद्धि - बल की प्राप्ति होती है, उस ज्ञान का अभिमान करने जैसा नहीं है, क्योंकि किस समय ज्ञानावरणीय कर्म उदय में आएगा और व्यक्ति बुद्धिहीन हो जाएगा, कुछ भी पता नहीं है।
अच्छे-अच्छे बुद्धिशाली व्यक्ति भी पापोदय के कारण पागल बन जाते हैं….. उन्हें कुछ भी याद नहीं रह पाता है। वह सभी के हंसी के पात्र बन जाते हैं, अतः अपने ज्ञान का कभी अभिमान मत करना।
आम के वृक्ष पर ज्योंहि फल लगते हैं त्योंहि आम का वृक्ष झुक जाता है….. वह अत्यंत ही नम्र बन जाता है। एक सामान्य मानव भी उस फल को आसानी से प्राप्त कर लेता है।
बस, इसी प्रकार ज्ञानी वही कहलाता है, जो ज्ञान की प्राप्ति के साथ नम्र बनता जाता है। जो विनम्र है….. उसी का ज्ञान सफल और सार्थक है।
भोजन यदि पच जाता है तो शरीर में शक्ति आती है, बस., इसी प्रकार जीवन में जब ज्ञान पच जाता है, तब नम्रता पैदा होती है।
भगवान महावीर प्रभु की अंतिम देशना, जो 'उत्तराध्ययन सूत्र' के नाम से आज भी विद्यमान है, उस उत्तराध्ययन सूत्र में सबसे पहला अध्ययन विनय अध्ययन ही है।
विनय को धर्म का मूल कहा गया है। जो विनीत है, वही वितराग परमात्मा के द्वारा निर्दिष्ट वास्तविक धर्म को अपने जीवन में आत्मसात कर सकता है, जो अविनीत है, वह सच्चे धर्म का आराधक भी बन सकता है।
विनय वही कर सकता है, जिसने अभिमान का त्याग किया हो।
ज्ञान के मुख्य दो प्रकार हैं।
१) क्षायिकज्ञान
२)क्षायोपशमिक ज्ञान
केवलज्ञान क्षायिकज्ञान है। एक बार उस ज्ञान की प्राप्ति हो जाने के बाद वह ज्ञान कभी जाने वाला नहीं है।
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान और मन: पर्यवज्ञान ये चार ज्ञान क्षायोमिक ज्ञान कहलाते हैं। ये ज्ञान आने के बाद उन ज्ञानों पर पुनः आवरण आ सकता है अर्थात इन ज्ञानों का क्षयोपशम ऐसा है, जो समय आने पर नष्ट भी हो सकता है।
अपने ज्ञान का अभिमान कभी ना करें। अपने ज्ञान का प्रदर्शन कभी ना करें।
दस पूर्वधर महर्षि स्थूलभद्र मुनि ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया। वंदन करने के लिए आ रही अपनी बहनों को अपनी शक्ति बताने के लिए सिंह का रूप धारण किया। परिणाम यह आया कि गुरुदेव ने आगे के सूत्र प्रदान करने से इंकार कर दिया। कारण एक ही था - वह अपने ज्ञान को पचा नहीं पाए।
वर्तमान में अपने को प्राप्त हुई बुद्धि तो मति ज्ञान का एक प्रकार है। उस बुद्धि का क्या गर्व करना ?
पूर्वकाल के महापुरुषों में बुद्धि का ऐसा
क्षयोपशम था कि एक बार सुनी हुई बात को हमेशा के लिए याद रख लेते थे।
अपना क्षयोपशम कितना मंद है - सुबह याद किया शाम को भूल जाते हैं।
पूर्व के महापुरुषों ने जिन अर्थगंभीर सूत्रों का सृजन किया,ऐसा सर्जन करने की हम में ताकत है ? यदि नहीं, तो उस बुद्धि का क्या गर्व करना।
बस, इसी प्रकार जब व्यक्ति प्राप्त ज्ञान को नहीं पचा पाता है, तब जीवन में अभिमान ही पैदा होता है।
तब का अजीर्ण क्रोध है तो ज्ञान का अजीर्ण अहंकार है।
पूर्व जन्म में की गई ज्ञान की आराधना के फल स्वरूप ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से बुद्धि - बल की प्राप्ति होती है, उस ज्ञान का अभिमान करने जैसा नहीं है, क्योंकि किस समय ज्ञानावरणीय कर्म उदय में आएगा और व्यक्ति बुद्धिहीन हो जाएगा, कुछ भी पता नहीं है।
अच्छे-अच्छे बुद्धिशाली व्यक्ति भी पापोदय के कारण पागल बन जाते हैं….. उन्हें कुछ भी याद नहीं रह पाता है। वह सभी के हंसी के पात्र बन जाते हैं, अतः अपने ज्ञान का कभी अभिमान मत करना।
आम के वृक्ष पर ज्योंहि फल लगते हैं त्योंहि आम का वृक्ष झुक जाता है….. वह अत्यंत ही नम्र बन जाता है। एक सामान्य मानव भी उस फल को आसानी से प्राप्त कर लेता है।
बस, इसी प्रकार ज्ञानी वही कहलाता है, जो ज्ञान की प्राप्ति के साथ नम्र बनता जाता है। जो विनम्र है….. उसी का ज्ञान सफल और सार्थक है।
भोजन यदि पच जाता है तो शरीर में शक्ति आती है, बस., इसी प्रकार जीवन में जब ज्ञान पच जाता है, तब नम्रता पैदा होती है।
भगवान महावीर प्रभु की अंतिम देशना, जो 'उत्तराध्ययन सूत्र' के नाम से आज भी विद्यमान है, उस उत्तराध्ययन सूत्र में सबसे पहला अध्ययन विनय अध्ययन ही है।
विनय को धर्म का मूल कहा गया है। जो विनीत है, वही वितराग परमात्मा के द्वारा निर्दिष्ट वास्तविक धर्म को अपने जीवन में आत्मसात कर सकता है, जो अविनीत है, वह सच्चे धर्म का आराधक भी बन सकता है।
विनय वही कर सकता है, जिसने अभिमान का त्याग किया हो।
ज्ञान के मुख्य दो प्रकार हैं।
१) क्षायिकज्ञान
२)क्षायोपशमिक ज्ञान
केवलज्ञान क्षायिकज्ञान है। एक बार उस ज्ञान की प्राप्ति हो जाने के बाद वह ज्ञान कभी जाने वाला नहीं है।
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान और मन: पर्यवज्ञान ये चार ज्ञान क्षायोमिक ज्ञान कहलाते हैं। ये ज्ञान आने के बाद उन ज्ञानों पर पुनः आवरण आ सकता है अर्थात इन ज्ञानों का क्षयोपशम ऐसा है, जो समय आने पर नष्ट भी हो सकता है।
अपने ज्ञान का अभिमान कभी ना करें। अपने ज्ञान का प्रदर्शन कभी ना करें।
दस पूर्वधर महर्षि स्थूलभद्र मुनि ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया। वंदन करने के लिए आ रही अपनी बहनों को अपनी शक्ति बताने के लिए सिंह का रूप धारण किया। परिणाम यह आया कि गुरुदेव ने आगे के सूत्र प्रदान करने से इंकार कर दिया। कारण एक ही था - वह अपने ज्ञान को पचा नहीं पाए।
वर्तमान में अपने को प्राप्त हुई बुद्धि तो मति ज्ञान का एक प्रकार है। उस बुद्धि का क्या गर्व करना ?
पूर्वकाल के महापुरुषों में बुद्धि का ऐसा
क्षयोपशम था कि एक बार सुनी हुई बात को हमेशा के लिए याद रख लेते थे।
अपना क्षयोपशम कितना मंद है - सुबह याद किया शाम को भूल जाते हैं।
पूर्व के महापुरुषों ने जिन अर्थगंभीर सूत्रों का सृजन किया,ऐसा सर्जन करने की हम में ताकत है ? यदि नहीं, तो उस बुद्धि का क्या गर्व करना।
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