क्रोध के लिए वर्षों तक नर्क के दु:खों को सहना पड़ता है। Krodh ke liye varshon tak narak ke dukhon ko Sahana padta hai.
क्रोध परिताप उत्पन्न करता है, इसीलिए वह सदैव मन को जलाता रहता है, वह क्रोध ही सभी मनुष्य के हृदय में उद्वेंग पैदा करता है। जब क्रोध किया जाता है तब संपूर्ण वातावरण ही उद्वेगपूर्ण हो जाता है। इतना ही नहीं क्रोध वैर का संबंध बनाता है। क्रोध सुगति का नाश करता है। प्राणी का अध:पतन कराने वाला भी क्रोध ही है। शास्त्रकारों में तो क्रोध को अग्नि की उपमा दी है, जैसे अग्नि सभी घास के समूह को जला देती है वैसे ही क्रोध सभी गुणों को जला देता है।
क्रोध से करोड़ो जन्म की तप - जप निष्फल हो जाते हैं। चण्ड कौशिक का दृष्टांत तो प्रसिद्ध ही है। वैसा ही दृष्टांत करंट -उत्करट का इस प्रकार से है -
करट और उत्करट नाम के दो भाई थे। ये दोनों सगे भाई तो नहीं किंतु मासी - मासी के लड़के थे। वे दोनों अध्यापक का काम करते थे। एक बार उनको संसार से वैराग्य उत्पन्न हो गया, इसीलिए उन्होंने व्रत ग्रहण किये। वे बहुत तपस्या करने लगे। पृथ्वीतल पर विहार करते - करते वे कुणाला नगरी में चौमासा करने के लिए आए और ग्राम में घूम कर किल्ले के पास एक खाई में बैठ कर तपस्या करने लगे।
एक बार उसी नगर में मूसलाधार वर्षा होने की संभावना थी। परंतु क्षेत्रदेवता ने सोचा कि वर्षा होगी तो ये साधु पानी में बह जाएंगे, ऐसा सोचकर कुणाला नगरी में वर्षा को रोक दिया। नगरी में पानी नहीं बरसा जबकि अन्य सभी नगरियों में खूब पानी बरसा।
गांव के मनुष्य कारण जान गए कि इन्हीं मुनियों के कारण हमारे नगर में वर्षा नहीं हुई। इसीलिए वे मुनियों को अंतः करण से श्राप देने लगे। अंत में सब लोग एकत्रित होकर मुनियों पर यष्ठि - मुष्ठि आदि का प्रहार करने लगे और उनको ग्राम से बाहर निकाल दिया। उस समय लोगों के किए ताड़नतर्जन से गुस्से होकर वह मुनि बोले -
करंट - ' वर्ष मेघ ! कुणालायां ' अर्थात हे वर्षा तू कुणाला में बरस।
उत्करट ने कहा - ' दिनानि दशपंच च ' अर्थात पन्द्रह दिन तक।
करट ने कहा - ' मुसलप्रमाणधाराभि: ' अर्थात मूसलाधार पानी बरस।
उत्करट ने कहा - ' यथा रात्रौ तथा दीवा ' अर्थात जैसे दिन में बरसे, वैसे ही रात में बरसे।
बस कहने भर की देरी थी कि वर्षा शीघ्र प्रारंभ हो गई और मूसलाधार वर्षा होने लगी। कुणाला में पन्द्रह दिन तक पानी बरसा। एक पल के लिए भी बंद नहीं हुई। जिससे संपूर्ण ग्राम में पानी ही पानी भर गया। सब लोग पानी में बहने लगे। बड़ा भारी संहार हुआ। इस महापाप का प्रायश्चित किए बिना ही, तीसरे वर्ष में वे दोनों साधु साकेत पुर नगर में काल के ग्रस्त हुए और सातवीं नरक में काल नामक नरकावास में बत्तीस सागरोपम की आयुष्य में उत्पन्न हुए।
महाक्रोध का यह परिणाम हुआ। क्षणिक क्रोध के लिए असंख्य वर्षों तक नर्क के महान दु:खों का सहना पड़ता है।
क्रोध से करट - उत्करट को महान दु:ख आए,सनत्कुमार को मान से शारीरिक दु:ख आए,मल्लीनाथ जी को माया से तथा धवल मम्मण - सागर सेठ को लोभ से महा दु:खों का भोगना पड़ा। अत: आराधना तभी सफल एवं कर्म निर्जरा का हेतु बनती है जब कषाय आदि चारों का संवर किया जाए।
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