वाणी सरस्वती देवी का स्वरूप है। मानव को पूर्व के पुण्य से प्राप्त उत्तम सामग्रियों में से यह एक सुंदर सामग्री है। स्व-पर के उपकार को साधने वाला इससे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। स्वयं श्री तीर्थंकर देव ने केवल ज्ञान प्राप्त करने के बाद संसार के समस्त आत्माओं के उपकार के लिए वाणी द्वारा ही ज्ञान का प्रकाश किया है। परंतु वाणी का विवेकपूर्वक सदुपयोग करना जिन्हें आता है, उन्हीं पुण्यवंत पुरुषों की वाणी संसार में लोकोपकारक बनती है।
विवेक से रहित और संयम - हीन वाणी, हरे - भरे खेतों को उजाड़ देने वाले एवं सैकड़ों गांवों को डुबो देने वाले पानी के प्रवाह के समान, संसार में समाधि, शांति और स्वस्थता का नाश कर अनेक विशेष, विद्वेष एवं वैमनस्य पैदा कर कालकूट विष का काम करती है। इसीलिए ज्ञानी पुरुषों ने वाणी के संयम पर बहुत भार दिया है।
'बन सके तो मत बोलो, जरूरत होने पर बोलो परंतु विनय - विवेक और औचित्य का ध्यान रख कर बोलो।' जो भी बोला जाए वह अपने अधिकार क्षेत्र की मर्यादा को ध्यान में रखकर ही बोला जाना चाहिए।
बोलने की आवश्यकता हो तो सत्य निष्ठा के साथ सच्ची बात बोलो। परंतु सब सत्य बोलने योग्य नहीं होते, क्योंकि हम अपनी अल्प बुद्धि से सत्य की व्याख्या करने में समर्थ नहीं है।
सत्य अपेक्षित वस्तु है। एक दृष्टि से जो बात सत्य है, वह दूसरी दृष्टि से असत्य बन जाता है। इसीलिए सत्य का आग्रह रखने वालों को सत्य का स्वरूप जानने के लिए सर्वज्ञानी पुरुषों के सिद्धांतों को जानना समझना चाहिए। तभी सत्य का यथार्थ निर्णय हो सकता है। सत्य सत्य, सारासार, हिताहिता का विवेक करके वाणी का सदुपयोग करने वाला व्यक्ति ही संसार में शांति, स्वस्थता और सुख - समृद्धि का इतिहास बना सकता है।
विवेक रहित बुद्धि, वाणी या विचारों की कीमत फूटी कौड़ी जितनी भी नहीं है। कल - रहित बल जैसे उपकारक होने की बजाय संहारक बनता है वैसे ही विवेक - बिना बोली गई वाणी, शराब से उन्मत तक बने हुए शराबी के हाथ में रही हुई तलवार की तरह भयंकर होती है।
सचमुच विवेक, एक दीपक है। क्षुब्ध सागर में झोले खाती हुई जीवन - नौका का वह कुशल कर्णधार है। विवेकहीन बोली गई वाणी ने रामायण - महाभारत काल में भयंकर अनर्थो को जन्म दिया है। राजसभा में आते हुए दुर्योधन का पानी में फिसल पड़ा। ऊपर से 'अंधों के अंधे ही होते हैं' - ऐसी विवेक हीन वाणी के घाव दुर्योधन को लगे। जिसके कारण कौरव - पांडवों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। कैकई जैसी सुशील सुन्नारी ने बिना विचारे वाणी बोलकर अयोध्या के राजकुल में और राज्य में अनेक उत्पातों को जन्म दिया।
इसीलिए कहा जाता है कि 'जब बोलने की इच्छा हो तो विवेक पूर्वक बोलो।' इसमें ही वाणी का सदुपयोग है। माता सरस्वती की सच्ची उपासना वाणी के संयम में रही हुई है। वाणी का संयम सबके लिए हितकर है। इनमें जो भी देश, समाज या धर्म के क्षेत्र में महत्व के जवाबदारी पूर्ण स्थान पर रहे हुए हों उनको तो बोलने में बहुत ही विवेक से काम लेना चाहिए।
बड़प्पन उम्र से नहीं अच्छे कर्मों से सिद्ध होता है badappan umra se nahin acche karmon se siddh hota hai
बड़ा तो गधा भी हो जाता है और कुत्ता भी हो जाता है, गुंडा भी हो जाता है और दुर्जन भी हो जाता है, चोर भी हो जाता है और व्यभिचारी भी हो जाता है। मात्र समय व्यतीत होता है और यह सभी बड़े हो जाते हैं। परंतु, यह " बड़प्पन " न तो गौरवप्रद बनता है और न ही किसी के लिए आलंबन रूप बनता है। परंतु…… एक बड़प्पन ऐसा है कि जिसका संबंध समय के साथ नहीं, पर सत्कार्यों के साथ है। उम्र के साथ नहीं, पर विवेक के साथ है। यह बड़प्पन गौरवप्रद भी बनता है और अनेकों के लिए आलंबन रूप भी बनता है। एक सनातन सत्य हमें आंखों के सामने रखना है और वह यह है कि जिंदगी की लंबाई बढ़ाने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते लेकिन हमारे हाथ में यह दो चीजें हैं - जिंदगी की चौड़ाई हम बढ़ा सकते हैं, जिंदगी की गहराई हम बढ़ा सकते हैं। जीवन को यदि हम सत्कार्यों से महका रहे हैं तो हमारे जीवन की चौड़ाई बढ़ रही है और उन सत्कार्यों के फल - स्वरुप यदि हमारे मन की प्रसन्नता बनी रहती है तो हमारे जीवन की गहराई बढ़ रही है। पर कैसी दयनीय दशा है हमारी ? जीवन की इस जिस लंबाई को बढ़ाने में स्वयं परमात्मा को भी सफलता नहीं मिली उस लंबाई को बढ़ाने ...
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